उत्तराखंड आपदा: ग्लेशियरों की सैर पर जाने वालों से प्रशासन ‘अंजान’, नहीं है कोई रिकॉर्ड

रेस्क्यू कार्य चलने के बावजूद प्रशासन को ग्लेशियर में फंसे हुए लोगों की सही जानकारी नहीं है। पिंडारी] कफनी और सुंदरढूंगा जाने के लिए वन विभाग में पंजीकरण कराना जरूरी है लेकिन 73 लोग ग्लेशियर पहुंच गए और वहां फंस गए, लेकिन उनका पंजीकरण करना तो दूर प्रशासन को उनके जाने तक की भनक नहीं लगी।

Harish chandra andola पिंडर घाटी के ग्लेशियरों की सैर पर जाने के लिए वन विभाग कपकोट में पंजीकरण कराता है, जिसका डाटा पर्यटन विभाग को भेजा जाता है। पर्यटन विभाग इसी डाटा के आधार पर वर्षभर में जिले में आने वाले विदेशी और देशी सैलानियों के आंकड़े जारी करता है। वन विभाग के कपकोट कार्यालय में पंजीकरण कराने के बाद पर्यटकों से कुछ शुल्क लेकर पर्ची काटी जाती है, जिसकी जांच ग्लेशियर रेंज में कराने के बाद ही पर्यटक ग्लेशियरों की सैर कर सकते हैं। पंजीकरण के आधार पर प्रशासन को पिंडारी, कफनी, सुंदरढूंगा आदि स्थानों पर गए पर्यटकों की सटीक जानकारी रहती है। वहीं प्रशासन को भी पर्यटकों से राजस्व प्राप्त होता है। पर्यटकों की जानकारी रखने के लिए अपनाई जाने वाली उक्त प्रक्रिया बेहद सरल है, बावजूद इसके संबंधित विभाग इसके लिए गंभीर नजर नहीं रहा, जिसका परिणाम अब दिखाई दे रहा है। तीन दिन से प्रशासनिक अमला सुंदरढूंगा में हताहत लोगों को रेस्क्यू करना तो दूर उनकी लोकेशन तक नहीं तलाश सका है। कफनी ग्लेशियर में भी फंसे पर्यटकों को रेस्क्यू नहीं किया जा सका है। द्वाली में 34 लोगों के फंसने की बात की जा रही थी, लेकिन रेस्क्यू के समय संख्या 42 पहुंच गई। इससे साफ जाहिर होता है कि ट्रैंकिंग रूटों पर जाने वालों की जानकारी और निगरानी को लेकर प्रशासन कतई गंभीरता से कार्य नहीं कर रहा है। ट्रैकर ग्लेशियरों के लिए रवाना हो गए और इसकी भनक तक सरकारी तंत्र को नहीं लगी। यह गंभीर चूक का मामला है। सेना के एमआई हेलीकॉप्टर शुक्रवार को सुंदरढूंगा ग्लेशियर में हताहत पर्यटकों की टोह लेने गए, लेकिन मौसम खराब होने के कारण बैरंग लौट आए। करीब पौने एक बजे गाजियाबाद से सेना के दो चॉपर केदारेश्वर मैदान में उतरे। एक बजे चॉपर ग्लेशियरों की टोह लेने रवाना हुए। हेलीकॉप्टर में सेना के जवानों के साथ एसडीआरएफ के जवान भी मौजूद थे। 1:28 पर दोनों चॉपर वापस लौट आए। एसडीआरएफ के जवानों ने बताया कि ग्लेशियर में मौसम खराब था। इसके कारण सर्च अभियान नहीं चलाया जा सका है। अगर सुबह से खोजबीन चलती तो सफलता मिल सकती थी। विश्व प्रसिद्ध पर्यटक स्थल होने के बावजूद पिंडर घाटी संचार सुविधाओं से महरूम है। शासन-प्रशासन क्षेत्र में सेटेलाइट फोन होने के दावे करता रहा है, लेकिन ऐन मौके पर आई आपदा ने सेटेलाइट फोन के दावों की पोल खोलकर रख दी है। संचार सुविधा नहीं होने से तीन दिन की भारी बारिश का अलर्ट भी क्षेत्र के लोगों को पता नहीं चला। हालांकि शासन-प्रशासन मोबाइल नेटवर्क की तरह सेटेलाइट सेवा के भी बाधित होने की बात कर रहा है। डीएफओ ने ग्लेशियर जाने वाले किसी भी ट्रैकर का पंजीकरण नहीं होने की बात कही है, जबकि वन क्षेत्र में पड़ने वाले ग्लेशियरों में जाने से पहले वन विभाग में पंजीकरण करना आवश्यक है। इस मामले की जांच की जाएगी और भविष्य में सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए कड़े कदम उठाए जाएंगे। ट्रैकरों का पंजीकरण अनिवार्य किया जाएगा। पिंडारी, कफनी ग्लेशियर और सुंदरढूंगा घाटी के ट्रैकिंग रूट अलग-अलग होने के कारण प्रशासन के पास भी ट्रैकरों की जानकारी नहीं होती है। चमोली, पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिले से अधिकतर ट्रैकर हिमालय की तरफ जाते हैं। तीन जिलों के बीच समन्वय नहीं होने के कारण आपदा आने पर उन्हें रेस्क्यू करना मुश्किल काम हो जाता है। पिछले तीन दिनों से जिला प्रशासन की टीम सुंदरढूंगा में हताहत हुए पांच बंगाली ट्रैकरों और एक लापता जैकुनी गांव के गाइड को रेस्क्यू नहीं कर पा रही है। गाइडों के अनुसार कुछ ट्रैकरों सुंदरढूंगा से चमोली जिले की तरफ भी जाने की सूचना है। लेकिन उनकी सलामती के लिए केवल दुआएं की जा सकती हैं।देसी और विदेशी ट्रैकरों के साथ स्थानीय गाइडों की मदद जरूरी तय की जानी चाहिए। स्थानीय गांव के लोगों का पिंडर घाटी एक तरह से जंगल है। वह लगभग प्रतिदिन हिमालय की तरफ आते और जाते हैं। यदि पर्यटक भटक गए तो उन्हें यह लोग रास्ता आदि में मदद कर सकते हैंपर्वतारोही ने कहा कि प्रशासन ने आपदा के समय सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए बादियाकोट, बाछम, खाती आदि स्थानों पर सेटेलाइट की व्यवस्था की थी। लेकिन यह शोपीस बने हुए हैं। इसके अलावा धूर में लगा बीएसएनएल का टावर भी ठप है। यदि स्थानीय ग्रामीणों को वाकी टॉकी रखने की अनुमति मिलती है तो यह ट्रैकरों के लिए भी लाभदायक होगा। जिला अस्पताल के डा. राजीव उपाध्याय ने बताया कि हिमालय की तरफ जाने वाले अधिकतर देसी पर्यटक अंजान होते हैं। उन्हें साथ में दवाइयां, आक्सीजन आदि साथ में ले जाना आवश्यक है। हिमालय का मौसम पल में बदल जाता है। बर्फबारी और बारिश होती है। जिसके बाद ठंड लगती है। बिना दवाइयों के यहां जाना भी जान को खतरा रहता है।उत्तराखंड में बिना अनुमति ग्लेशियरों की सैर पर गए पर्यटकों के खिलाफ वन विभाग सख्त कदम उठाएगा। आपदा के दौरान पंजीकरण संबंधी कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठने के बाद विभाग ने ट्रैकरों को भेजने वाले टूर ऑपरेटरों का पता लगाने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने का फैसला कर लिया है। विभाग ने बीते दिनों आई आपदा में कई ट्रैकरों की मौत के बाद सबक लेते हुए भविष्य के लिए पंजीकरण संबंधी कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने के लिए भी कमर कस ली है।प्रदेश में तीन दिन की बारिश के बाद पिंडारी, सुंदरढूंगा और कफनी ग्लेशियरों में करीब 75 पर्यटक और स्थानीय लोग फंस गए थे। पर्यटकों में बंगाल, महाराष्ट्र के अलावा अमेरिकी मूल के लोग भी शामिल थे। ट्रैकरों के फंसने के बाद खोजबीन की गई तो किसी का भी रिकॉर्ड वन विभाग के पास दर्ज नहीं था, जबकि वन क्षेत्र में पड़ने वाले ग्लेशियरों की यात्रा के लिए वन विभाग में पंजीकरण कराना अनिवार्य है प्रदेश में तीन दिन की बारिश के बाद पिंडारी, सुंदरढूंगा और कफनी ग्लेशियरों में करीब 75 पर्यटक और स्थानीय लोग फंस गए थे। पर्यटकों में बंगाल, महाराष्ट्र के अलावा अमेरिकी मूल के लोग भी शामिल थे। ट्रैकरों के फंसने के बाद खोजबीन की गई तो किसी का भी रिकॉर्ड वन विभाग के पास दर्ज नहीं था, जबकि वन क्षेत्र में पड़ने वाले ग्लेशियरों की यात्रा के लिए वन विभाग में पंजीकरण कराना अनिवार्य है। ग्लेशियरों की सैर पर जाने वाले पर्यटकों की कपकोट और लोहारखेत में बने वन विभाग के बैरियर पर पंजीकरण और जांच की जाती है। कपकोट में पंजीकरण नहीं कराने वाले को लोहारखेत में रोक दिया जाता है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में कर्मी मोटर मार्ग और अन्य रास्तों के बनने के बाद पर्यटक बिना पंजीकरण कराए आसानी से ग्लेशियर तक पहुंच रहे हैं। बीते दिनों हुए हादसे से पहले प्रशासन ने इस मसले को गंभीरता से नहीं लिया था, हालांकि अब कपकोट या लोहारखते के बैरियर को खाती या खर्किया में शिफ्ट कराने को लेकर चर्चा हो रही है। डीएफओ, डीएम और एसपी ने इस प्रस्ताव पर चर्चा भी कर ली है। रेस्क्यू अभियान समाप्त होने के बाद इसका प्रस्ताव को अमलीजामा पहनाने पर कार्य होगा। वन विभाग के ग्लेशियर रेंज के आरओ विजय मेलकानी ने बताया कि ग्लेशियरों की सैर पर जाने वाले देशी पर्यटकों के लिए एक सप्ताह तक का पंजीकरण शुल्क 67 रुपये और विदेशी पर्यटकों के लिए 122 रुपये है। एक सप्ताह के बाद यह प्रतिदिन के हिसाब से बढ़ता है। बताया कि बिना अनुमति के ग्लेशियरों में पकड़े जाने वाले के खिलाफ वन अधिनियम, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम और वन पंचायत नियमावली के तहत कार्रवाई की जा सकती है।बिना अनुमति ग्लेशियरों की सैर पर गए पर्यटकों के नाम, पते एकत्र किए हैं। जिसके आधार पर टूर ऑपरेटरों का पता लगाया जा रहा है। खर्किया और खाती में पंजीकरण बैरियर को शिफ्ट करने का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। भविष्य में बिना पंजीकरण कराए ग्लेशियर जाने वाले पर्यटकों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। पंजीकरण के आधार पर प्रशासन को पिंडारी, कफनी, सुंदरढूंगा आदि स्थानों पर गए पर्यटकों की सटीक जानकारी रहती है। वहीं प्रशासन को भी पर्यटकों से राजस्व प्राप्त होता है।पर्यटकों की जानकारी रखने के लिए अपनाई जाने वाली उक्त प्रक्रिया बेहद सरल है, बावजूद इसके संबंधित विभाग इसके लिए गंभीर नजर नहीं रहा, जिसका परिणाम अब दिखाई दे रहा है। तीन दिन से प्रशासनिक अमला सुंदरढूंगा में हताहत लोगों को रेस्क्यू करना तो दूर उनकी लोकेशन तक नहीं तलाश सका है। कफनी ग्लेशियर में भी फंसे पर्यटकों को रेस्क्यू नहीं किया जा सका है।द्वाली में 34 लोगों के फंसने की बात की जा रही थी, लेकिन रेस्क्यू के समय संख्या 42 पहुंच गई। इससे साफ जाहिर होता है कि ट्रैंकिंग रूटों पर जाने वालों की जानकारी और निगरानी को लेकर प्रशासन कतई गंभीरता से कार्य नहीं कर रहा है। ट्रैकर ग्लेशियरों के लिए रवाना हो गए और इसकी भनक तक सरकारी तंत्र को नहीं लगी। यह गंभीर चूक का मामला है।

लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत  हैं।

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