राज्य के हित के लिए त्रिवेंद्र सिंह रावत की होगी सीबीआई जाँच, कोर्ट ने दिए आदेश

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने मंगलवार को पत्रकार उमेश शर्मा के खिलाफ मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की छवि बिगाड़ने के मामले में दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया और मामले में सीबीआई जांच के आदेश दिए। शर्मा के खिलाफ देहरादून के एक थाने में दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने के आदेश देते हुए न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी की एकल पीठ ने यह भी कहा कि इस मामले के सभी दस्तावेज अदालत में जमा कराए जाएं। यह आदेश शर्मा की उस याचिका पर आया है जिसमें उन्होंने अदालत से देहरादून में दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की प्रार्थना की थी। प्राथमिकी में कहा गया था कि पत्रकार ने सोशल मीडिया के जरिए मुख्यमंत्री रावत का नाम पैसों के लेन-देन में घसीटते हुए उनकी छवि खराब की।

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पत्रकार ने सीएम पर क्या लगाए थे आरोप?

पत्रकार ने एक रिटायर्ड प्रोफेसर और उनकी पत्नी के बैंक खातों का जिक्र करते हुए कहा था कि नोटबंदी के दौरान उनके खातों में झारखंड से पैसे भेजे गए थे. जिसके बाद उन्हें कहा गया था कि इन पैसों को वो मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को दें. प्रोफेसर की पत्नी को सीएम की पत्नी की बहन बताया गया था. इन आरोपों के बाद रिटायर्ड प्रोफेसर ने पत्रकार उमेश शर्मा के खिलाफ देहरादून में ब्लैकमेल करने और कई धाराओं के तहत मामला दर्ज करने की मांग की.

पत्रकार के खिलाफ तुरंत मामला भी दर्ज हुआ, यहां तक गैंगस्टर एक्ट भी लगाया गया. इसके ठीक बाद पत्रकार ने नैनीताल हाईकोर्ट में याचिका दायर करते हुए राहत की मांग की. इस याचिका पर हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए पत्रकार की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी. साथ ही उन्हें जांच में सहयोग करने को कहा था। अब इसी मामले को लेकर जांच के बाद हाईकोर्ट ने पत्रकार के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने और सीएम के खिलाफ लगाए गए आरोपों की सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं. अब हाईकोर्ट ने आदेश जारी कर कहा है कि सीबीआई इन आरोपों को लेकर एक नई एफआईआर दर्ज करे और इनकी जांच हो. इस मामले में उमेश शर्मा के अलावा एक अन्य पत्रकार का नाम भी शामिल है।
कोर्ट ने कहा, राज्य के हित में है सच का सामने आना
कोर्ट ने पत्रकार की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री पर लगाए गए आरोप गंभीर हैं। इनकी जांच होना और सच का सामने आना जरूरी है। यह राज्य के हित में ही होगा कि सभी तरह के संदेह खत्म हों। इसलिए कोर्ट का मानना है कि सीबीआई को मामले में एफआईआर दर्ज करनी चाहिए और पूरे मामले की जांच करनी चाहिए।

 

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