कैंसर रोग के इलाज के प्रयोग में लाई जाने वाली वनककड़ी का अस्तित्व खतरे में है।

                                                                          डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड

उत्तराखंड में यहां औषधीय गुणों वाली कई 175 जड़ी-बूटियां पहचानी गई हैं। इनमें लगभग 35 जड़ी-बूटियां तो ऐसी हैं जिनके नष्ट होने का खतरा है। इसी वजह से इन जड़ी-बूटियों के दोहन को प्रतिबंधित किया गया है। प्रतिबंध के बावजूद इन दुर्लभ जड़ी-बूटियों का अंधाधुंध दोहन भी जारी है। उत्तराखंड के रूप में नया प्रदेश बनने के बाद वहां की सरकार वनौषधि संरक्षण पर ज्यादा ध्यान दे रही है। उत्तराखंड के जंगलों में अनेक दुर्लभ जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं जिनसे अनेक गंभीर रोगों की दवा भी बनाई जाती है। वनककड़ी के बारहमासी जड़ी बूटी podophyllum hexandrum है जहरीला संयंत्र है लेकिन जब यह संसाधित है औषधीय गुण है। प्रकंद के संयंत्र के शामिल एक राल, भारतीय podophyllum राल के रूप में आम तौर पर और व्यावसायिक रूप से जाना जाता है।

 

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कैंसर जिसे असाध्य रोग कहा जाता था उसकी दवा बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले वनककड़ी कश्मीर और सिक्किम क्षेत्र में ही पाई जाती है। लाहौल स्पीति, किन्नौर, कुल्लू और चंबा में 2500 से 4500 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पैदा होने वाली यह औषधी 500 से 800 रुपए प्रतिकिलो के हिसाब से बिकती है। वन ककड़ी उन महत्वपूर्ण जड़ी बूटियों में हैं जो खतरे की जद में हैं। इन जड़ी बूटियों का उपयोग दवाएं बनाने में सबसे अधिक होता है, इसी के चलते इनका सबसे अधिक दोहन होता है। हिमालयी क्षेत्र में पैदा होने वाली 121 प्रजाति की जड़ी बूटियां खतरे में आ गई हैं। औषधीय पौधों की जगह भी प्रभावित हुई है। जबकि कुछ पौधे ऊंचाई की ओर शिफ्ट हो गए हैं। वह ये भी जोड़ते हैं कि इन औषधीय पौधों की जानकारी भी वहां रह रहे लोगों तक सीमित है।

 

कैंसर रोग के इलाज के प्रयोग में लाई जाने वाली वनककड़ी का अस्तित्व खतरे में है।

 

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बाहर के लोगों को इसके बारे में बहुत कम पता है। जबकि आयुर्वेद की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को बचाए रखने के लिए जितना इन औषधीय पौधों को बचाना जरूरी है, उतना ही इनके बारे में जानकारी इकट्ठा करना। ये जड़ी-बूटियां जैव-विविधता के संरक्षण के लिए तो जरूरी हैं ही, हिमालयी क्षेत्र में रह रहे लोगों की आजीविका का जरिया भी बन सकती हैं। आयुर्वेद में शरीर की कई बीमारियों का इलाज करने के सक्षम ऐसे औषधीय पौधे जिन पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है, उनमें शामिल हैं। इन जड़ी बूटियों को बचाने के लिए कृषि रक्षा अनुसंधान इकाई सक्रिय हो गई है। इकाई ने राज्य में तीन स्थानों पर हर्बल गार्डन तैयार कर खतरे में आई इन जड़ी बूटियों को बचाने की मुहिम शुरू कर दी गई है।

 

Podophylline condyloma तीक्ष्णता इलाज में मुख्य रूप से इस्तेमाल किया है. Podophylline से राहत गठिया में प्रभाव है, खांसी और दर्द को रोकने, रक्त और detoxification के संचलन मज़बूत है। एंटीवायरल एजेंटों Podophylline को हल कर सकते हैं. गर्म, सूजन कम, दर्द, टूट रक्त, दक्षता ऊतक पुनर्जनन को बढ़ावा देने के रूप में  कैंसर रोग के इलाज के प्रयोग में लाई जाने वाली वनककड़ी का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। हिमालयन रेंज में पैदा होने वाले इस औषधीय पौधे का पिछले दस सालों में अत्यधिक दोहन होने से यह खत्म होने की कगार पर है। हिमालयन फॉरेस्ट रिसर्च के साइंटिस्टों के अनुसार हिमाचल और जम्मू-कश्मीर के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पैदा होने वाले इस औषधीय पौधे के अस्तित्व को खतरा हो गया है।

 

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वनककड़ी और अन्य दो औषधीय पौधों अतिश और चौरा को बचाने के लिए राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड के साथ मिलकर इन्हें बचाने के लिए काम शुरू किया है। इस अभियान के तहत साइंटिस्टों ने हिमाचल और जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रों को दौरा कर वहां पर पैदा होने वाले औषधीय पौधों का संरक्षण शुरू किया है। इन तीनों औषधीय पौधों की उन्नत पौध नर्सरियों में तैयार कर लोगों को लगाने के लिए दी है और इसके अलावा इन लोगों को इसे उगाने के बारे में भी जानकारी देने का काम शुरू किया है। औषधीयपौधों के संरक्षण और उनकी खेती के प्रसार में जुटे साइंटिस्टों के अनुसार वनककड़ी, अतिश और चौरा के संरक्षण को लेकर अभी तक 8 बार लोगों को ट्रेनिंग दी गई है। इसमें 350 लोगों को औषधीय पौधों की पैदावार करने और इसकी मार्केट के बारे में बताया गया है।

 

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इसके अलावा एचएफआरआई की ओर से नर्सरियों में तैयार किए गए तीनों औषधियों के साढ़े तीन लाख पौधे उन क्षेत्रों में लोगों को बांटे गए हैं जहां पर ये औषधीय पौधे उग सकते हैं। यह पौधे सर्वाइव करने के बाद कई बीमारियों के इलाज में काम आएंगे, अब देखना यह है कि वनककड़ी की खेती आयुष मिशन के तहत की संभावनाए हैं. आने वाले समय में इनसे क्षेत्रों के गरीब किसानों की आर्थिक स्थिति कितनी ठीक हो पाती है. स्वतंत्रता के 73 वर्ष बाद भी उनकी यह बात प्रासंगिक है। इसलिए भारत का इलाज करने के लिए लाइलाज होते गांवों के इलाज को प्राथमिकता देनी होगी।

 

लेखक द्वारा उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर का अनुभव प्राप्त हैं, वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में  है.

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