दम तोड़ने लगा है कुमाऊँ मंडल का प्राचीन ताम्र उद्योग

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड 

कुमाऊँ मंडल की कला और शिल्प की परम्परा बहुत ही प्राचीन है। इनकी हस्तकला तो विरासत में प्राप्त हुई है। कुमाऊँ वासियों की अर्थव्यवस्था इससे काफी सुदृढ़ बनी है। सुदुर अंचलों में, हिमालय की बर्फीली वादियों में भी शिल्प की परम्परा हर क्षण पल्लवित होती रही। कालीन, गलीचे, दन, कम्बल, चुटके, थुलमें जैसी हस्तशिल्प की परम्परा एक ओर तिब्बत का सीमा क्षेत्र करीब होने तथा स्थानीय जरुरतों से घर-घर में पनपी तो दूसरी ओर

किंरगाल (arudinaria)   तथा बांस के बने डोके, डलिया सूपे आम जन की रोजमर्रा की जिन्दगी की अनिवार्य वस्तु हो जाने के कारण इनकी निर्माण विद्या स्थानीय उद्योग के रुप में विकसित हुई। ताँबे के बर्तन बनाने का कारोबार तो आज भी हजारों लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है। कभी कुमैंया भदेले (लोहे की कढ़ाई) लोहाघाट का प्रमुख उद्योग स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पेड़ -पौधों से रेशे निकालकर वस्त्र बनाने की परम्परा भी समृद्ध थी। घरों में प्रयुक्त होनेवाले दूध-दही के बर्तन भी काष्ट निर्मित होते थे। इनमें से कुछ उद्योग या तो धीरे - धीरे समाप्त हो गए या फिर कुछ उद्योग ऐसे हैं जो केवल कहीं-कहीं गाँव-देहात में जैसे-तैसे अपने आप को बचाये हुए हैं। समूचे पर्वतीय प्रदेश में ताम्र कारीगर प्राचीन समय से ही धातु कला में सिद्धहस्त थे। ये कारीगर ना केवल उत्कृष्ट ताम्रवस्तुऐं बना सकते थे बल्कि धातु निष्कर्षण की तकनीकी में भी प्रवीण थे। ताम्र कारीगर यद्यपि मुख्य रुप से चंद राजाओं के समय में पल्लवित होकर इस क्षेत्र में स्थापित हुए तो भी ताम्रकला के विकास की कहानी युगों पीछे तक जाती है। पर्वतीय क्षेत्र में भी एक सम्पन्न सभ्यता ताम्रयुग में थी। हल्द्वानी नगर के एक बर्तन व्यापारी के यहाँ से ताम्रयुगीन एक मानवाकृति प्राप्त हुआ। जिसे व्यापारी के पूर्वजों ने चालीस के दशक में अल्मोड़ा नगर में रद्दी तांबे के रुप में खरीदा था। पिथौरागढ़ जनपद के बड़कोट गाँव से ८ ऐसी और मानवाकृतियां भी प्राप्त हुई हैं। यह आयुध क्या है, इसका प्रयोजन क्या है;  इसे जानकारी के आभव में इसे मानवाकृति ही नाम दे दिया गया है। इसका ऊपरी भाग सिर की तरह गोल है, सिर के नीचे लम्बे दोनों ओर मुड़े हुए हाथ हैं। नीचे की ओर दो लम्बे नुकीले पैर हैं। पर इसमें वास्तविक हाथ पैर के कोई लक्षण नहीं हैं। लेकिन इतना निश्चित है कि काल क्रम के अनुसार यह लगभग २०००-१५०० ई. पू. तक पुरानी हो सकती है। ताम्र कारीगर जिन्हें स्थानीय लोग टम्टा के नाम से जानते है, यह मानते हैं कि वे सोलहवीं सदी में मुगलों के आक्रमण के बाद पर्वतीय क्षेत्र में आए थे। उस समय राजस्थान के चन्द्रवंशी शासक अपनी प्रजा के साथ राजस्थान से पिथौरागढ़ जनपद के चम्पावत नामक स्थान पर आकर बस गए। इसी समुह में से कुछ लोग राजस्थान के अन्य कारीगरों के साथ अल्मोड़ा जनपद के खरही पट्टी में बसे। तब भी ये लोग राजा की टकसाल में सिक्के ढ़ालने का कार्य भी करते थे। कुमाऊँ में गोरखा राज्य हो जाने पर भी टम्टा लोग सिक्के ढ़ालने का ही कार्य करते रहे। अंग्रेजों द्वारा कुमाऊँ पर अधिकार कर लेने के पश्चात स्थानीय तांबे की खानों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जिससे तांबे का खनन बन्द हो गया। बाद में इन लोगों से टकसाल का काम भी छीन लिया गया। तब गौलापालड़ी, गिवाड़ के कोट्यूड़ा आदि गाँवों में तांबे की खाने थी इसलिये टम्टाओं की बसावत भी खान क्षेत्र के आसपआस अधिक हुई। टम्टाओं को गंगाघाटी की ताम्र संचय संस्कृति के रचियताओं के वंशज भी बताया जाता हैं। अंग्रेजों द्वारा तांबे की खानों पर प्रतिबन्ध लगा दिये जाने से टम्टा लोगों को अपनी रोटी रोजी को सुरक्षित करने के लिए बाजारों और घरों के पुराने तांबे को गलाकर माल तैयार करना पड़ता था। इस प्रकार तैयार माल न तो खपत की दृष्टि से पर्याप्त पड़ता था न ही इससे गुजर बसर के लायक कच्चा माल ही उपलब्ध हो पाता था। इसलिये ताम्र शिल्प पर विपरीत प्रभाव पड़ा। टम्टा लोग स्वीकार करते हैं कि उन्हें चंद राजाओं द्वारा आशा से अधिक संरक्षण प्राप्त ङुआ। चंद राजा शिल्प के शौकिन थे। उन्हें नक्काशीदार वस्तुऐं भी बेहद पसन्द थी। राजा लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को प्रस्थान करते समय अपने लाव-लश्कर के साथ टम्टाओं को भी लेकर चलने लगे। चंद राजाओं ने इन लोगों को अपने राज्य की राजधानियों के समीप बसाया। टम्टाओं को राजधानी के पास की जगह प्रदान की गयीं। खूँट, खर्कटम्टा, खरही आदि के अतिरिक्त अल्मोड़ा नगर के टम्टा मोहल्ले में भी ये लोग बस गये। बाद में इन शिल्पियों के परिवारों में विस्तार हुआ और फैलाव के कारण अन्य जनपदों में भी ताम्रशिल्प का कार्य होने लगा। राजस्थान से आकर जिन गाँवों में यह लोग सबसे पहले बसे उनके नाम हैं-- गोसानी और भरियाल। बाद में इन गाँवों से ही टम्टा लोग नैनीताल जनपद के कुर्कटम्टा आदि में फैले। अल्मोड़ा में आने के बाद इनका विस्तार खरही पट्टी की ओर हुआ जहाँ सौभाग्य से इन लोगों को तांबे की खाने भी मिल गयीं। ककड़खान के पास सल्ला गाँव में भी टम्टा लोग इसी प्रकार बसे।  टम्टा लोगों के साथ खानों से धातु निकालने आगरी जाति का लोग भी आये थे । खरही में जनोटी पालड़ी गाँव के पास आगर नामक गाँव में आगरी लोग रहते हैं। परन्तु अब वे अपने परम्परागत उद्दम से वंचित हो गये हैं। आगरी लोग खानों से अयस्क निकालते थे। इस अयस्क की बारीक पिसाई की जाती थी। ताँबे के खानों के पास ही जीप्सम (gypsum) की खानें भी थीं। जिप्सम के साथ अयस्कों को भट्टी में गरम किया जाता था। इस भट्टी की गरमी से तांबा जब डलों के रुप में अलग हो जाता तब इन डलों को छाट लिया जाता था। तत्पश्चात घनोरिया को दिया जाता था। घनोरिया तांबे को पीट-पीटकर इसका कार्बन (carbon) बाहर निकाल देता। इस तरह तांबे का चक्का जैसा बन जाता था।  अब कच्चे माल के रुप में तांबे की चादर और चक्का प्रयोग होता है। जर्मन सिल्वर तथा टांके के लिए रसायन भी अतिरिक्त प्रयोग होते हैं। शीट सोलह से बाइस राज तक की प्रयोग की जाती हैं। स्थानीय तांबे की खाने बन्द हो जाने के कारण मिर्जापुर, रेवाड़ी, मुरादाबाद तथा जगाधरी से कच्चा माल आयात किया जाने लगा औजारों के रुप में पत्थर के सांचे, विभाजक-यंत्र, कत्ती, छेनी, खराद, पंच, आफर, संडासी, घन प्रमुख हैं। बर्तन को आधार देने के लिए निहाई का प्रयोग होता है।चक्के से गागर बनाने की प्रक्रिया विशिष्ट है। चक्के को गर्म कर चार आदमी घन से तबतक पीटते हैं जब तक कि पह एकसार पतली चादर जैसा न हो जाये। तब उसे गागर जैसा रुप दे दिया जाता है। इसकी तली में जोड़ नहीं लगाया जाता। बर्तन बनाने के लिए निहाई पर रखकर अलग-अलग तांबे की चादर के टुकड़ों को छैनी हथौड़े की सहायता से मनोकुल आकार दे दिया जाता है तत्पश्चातू इन्हें टाँके की सहायता से जोड़ लिया जाता है। बर्तन जब आकार ले लेता है तब पानी और गंधक  को तैजाब के हल्के विलयन से धोया जाता है तथा आधे घंटे तक इस विलयन में डुबाकर रखा जाता है। चमक(पोलिस) के लिए केवल कपड़े की सहायता से रगड़ई होती है। गागर बनाने के लिए हाथ के पंखे से चलनेपाली छोटी भट्टी आफर जो आम लोहार प्रयोग करते हैं,  का ही ताम्र कारीगर भी प्रयोग करते हैं। इसमें जिस ईंधन का प्रयोग किया जाता है, वह बगेट कहलाता है। चीड़ की वृक्ष के छाल की सबसे बाहरी पर्त का प्रयोग बगेट बनाने के लिए किया जाता है। बगेट की खूबी यह है कि यह धौंकनी के चलना बन्द होते ही बगेट की आंच भी मन्द पड़ जाती है जबकि सामान्य ईंधन में ऐसी सुविधा उपलब्द नहीं है। इससे ईंधन की बचत अलग से होती है।अल्मोड़ा में गागर बनने के बाद अन्य स्थानों की तरह उसमें तेजाब से सफाई नहीं की जाती। इसके लिए भट्टी के बगल में ही एक गड्डा बना लिया जाता है। इस गड्डे  में गागर को डालकर उसके ऊपर धान की भूसी को डाल दिया जाता है। तत्पशचातू भूसी में आग लगा दी जाती है। प्रायः आफर में गागर को लाल रंग निखर उठता है। यह रंग उतना स्वाभाविक होता है कि घिसने, रगड़ने, और निलन्तर प्रयोग से भी यह छूटता नहीं है। किसी भी वस्तु को तांबई रंग में लाने के लिए सामान्यतः रसायनों का प्रयोग नहीं किया जाता।ठंडा होने पर गागर को गढ़े से निकालकर उस पर हथौड़े से ठप्पे बनाये जाते हैं। इससे गागर का सौन्दर्य खिल उठता है। इस क्रिया को मठारना कहते हैं। मठारने के लिए लोटे का प्रयोग किया जाता है। गागर बनाने कि प्रक्रिया के दौरान जो कटपीस बचते हैं वे बेकार नहीं फेकें जाते। इनको एक कढ़ाई में, जिसे हिनौला कहते हैं में डालकर  दुबारा गला लिया जाता हैं, तत्पश्चात सांचे में ढ़ालकर उनके किंरग बना लिये जाते हैं। ये छल्ले गागर को उठाने के काम में आते हैं। छल्लों को मुनड़ा कहा जाता हैं। गगरी पर मुनड़ा जोड़ने वाले भाग को मुन कहते हैं। गागर की जुड़ाई के लिए जो टाँका प्रयोग किया जाता है वह बरसों के अनुभव का परिणाम है,  बना बनाया टाँका आयात नहीं किया जाता। शिल्पियों ने अपने परिश्रम से इसका विकास किया है। जुड़ाई का टाँका इतना पक्का होता है कि भले ही बर्तन टूट जाये, टाँका अपनी जगह पर ही रहता है। इसको राड कहा जाता है। कभी-कभी ताम्रशिल्पी एक विशिष्ट प्रकार का टाँका भी प्रयोग करते हैं। इस टाँके की गोपनियता वे बनाये रखना चाहते हैं। पीतल, तांबा और जर्मन सिल्वर एक समान तापमान पर नहीं पिघलते। इसलिए उनको जोड़ने के लिए टाँका भी ऐसा चाहिए जो अलग-अलग धातुओं को एक तापक्रम पर ही एक साथ जोड़ सके। स्थानीय शिल्पियों के पास यह विधा है। वे तीन अलग-अलग धातुओं को एक साथ जोड़कर पात्र बनाते हैं। गागर में मुँह के पास एक विशिष्ट प्रकार की डिजायन बनाने की परम्परा है। शिल्पियों का कथन है कि वे पर्वतीय क्षेत्र में बने हुए मन्दिरों की चन्द्रिका को उकेरते हैं। यह काम छेनी के सहायता से नहीं वरन् हथौड़े की सहायता से की जाती है।ताम्र कारीगर न केवल गागर जैसी वस्तुएं बनाते हैं अपितु सामाजिक-धार्मिक  जीवन में काम आनेवाली हर वस्तु का वे व्यवसायिक उत्पादन करते हैं। धार्मिक कार्यों में प्रयोग करने के लिए दीप, पंचपात्र, अर्घे, आचमन, बाद्दयंत्रों में ढ़ोल, नगाड़े, दमुट, तुरही, नागफेनी, रणसिंहा और झूकर, दैनिक प्रयोग की वस्तुओं में गागर, परात, तौले, फौले आदि बड़े स्तर पर उत्पादन होता है। अब लैम्पशेड, वाटर फिल्टर शोपीस, वालहैंगिग आदि बनने लगी हैं।  धीरे-धीरे फैले तांबे के ये कारीगर बागेश्वर तहसील के अन्तर्गत मल्ली व तल्ली खरही के बीस गाँवों में परम्परागत तांबे के बर्तन बनाते हैं। सर्वेक्षणों के अनुसार पिथौरागढ़ जनपद के गंगोलीहाट, थल, बेरीनाग आदि में ९४ परीवार पूरी तरह तांबे के बर्तन इत्यादि को बनाकर इस कला को जीवित रखे हुए हैं। अल्मोड़ा जनपद में ही परम्परागत रुप से पांच सौ परिवार इस शिल्प को जीवित रखकर परोक्ष, अपरोक्ष रुप से जीविका यापन कर रहें हैं। नैनीताल, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जनपदों के चार हजार से कुछ ज्यादा कारीगर आज भी इस पेशे को अपनाये हुए हैं। अनुमान है कि अकेले अल्मोड़ा जनपद में लगभग एक करोड़ रुपयों के तांबे की बिक्रि प्रतिवर्ष है। इस उद्योग से केवल पुरुष कारीगर ही जुड़े हैं। सामान्यतः भाड़े के मजदूरों से काम नहीं लिया जाता, परिवार के सदस्य ही काम निबटाते हैं। ताम्रकला उद्योग में पारम्परिक रुप से उत्पादित वस्तुओं के विपणन की समस्या नहीं है। गाँव-गाँव फेरी लगाकर बने माल का विक्रय किया जाता है। नये बर्तनों की नकद बिक्री के अलावा पुराने बर्तनों से भी विनिमय (अल्टा-पलटी) होता है। गागर,  तौले,  कलश,  परात,  लोटा, नरसिंहा,  तुरही आदि का विपणन उत्तराखंड के पर्वतीय जनपद एवं नेपाल में होता रहा है। चूँकि ये पात्र लोगों के सामाजिक, धार्मिक जीवन से जुड़े हैं इसलिए इनके विक्रय की कोई समस्या नहीं है। यह भी विश्वास है कि तांबे के बर्तन में रखा पानी पेट की बीमारीयों के लिए लाभप्रद होता है, इसलिए भी तांबे के बर्तनों का प्रचलन कुछ ज्यादा ही है। कई लोग तांबे के प्रयोग को समृद्धि का प्रतीक भी मानते हैं। शादी बारातों में तांबे के बर्तन का प्रचलन है। पुराने समय से ही पहाड़ के मेले व्यापारिक गतिविधियों का भी केन्द्र रहे हैं। इसलिए नंदादेवी, उत्तरायणी , थल, जौलजीवी, गोचर, पूर्णागिरी आदि मेलों में तांबे के बर्तनों का बाजार लगता था जिसमें लोग जरुरत की चीजों की खरीद-फरोख्त करते थे। तांबे से बना फिल्टर अब घर-घर की जरुरत हो गयी है। शासन स्तर पर भी इसके शोरुम खोले गये हैं। लेकिन इस सबके बावजूद ताम्रकारीगर बहुत खुशहाली का जीवन जी रहे हों, ऐसा नहीं है। आर्थिक रुप से समृद्ध न होने के कारण उनको कच्चे माल के लिए व्यापारियों   पर आश्रित रहना पड़ता है। छोटे-छोटे घरों में कारीगरों के निवास के कारण उनके सामने सुविधा सम्पन्न कार्यशाला भी एक स्वप्न है। जनपद का शायद ही ऐसा कोई कारीगर हो जिसके पास विपणन के लिए निजी छोटा सा काऊन्टर न हो। अब  कड़ों साल पुराना अल्मोड़ा का ताम्र उद्योग अब दम तोड़ने लगा है। अल्मोड़ा के टम्टा मोहल्ले में करीब 72 परिवार इस व्यवसाय से जुड़े थे और हर परिवार का अपना कारखाना था, लेकिन हाल के वर्षों में मशीनीकरण के आगे यहां के ताम्र कारीगर नहीं टिक पा रहे हैं। जिससे करीब 200 ताम्र कारीगरों की रोजी-रोटी पर असर पड़ा है और कई ताम्र शिल्पी रोजगार की तलाश में यहां से पलायन कर चुके हैं, जबकि कई कारीगरों ने इस काम को ही छोड़ दिया है।अल्मोड़ा का ताम्र उद्योग करीब 400 साल पुराना है। यहां के ताम्र कारीगरों के हाथों से बने तांबे के बर्तन आज भी दूर-दूर तक प्रसिद्ध हैं।

एक जमाने में इस उद्योग में काम करने वाले ताम्र कारीगर अच्छी खासी आय अर्जित करते थे और उनकी कला की काफी तारीफ भी होती थी। इन कारीगरों द्वारा बनाए गए परंपरागत तौला, गागर, परात, पूजा के बर्तन के अलावा वाद्य यंत्र रणसिंघा, तुतरी आदि बहुत प्रसिद्ध थे। कई लोग तो सिर्फ इन बर्तनों की खरीददारी के लिए अल्मोड़ा आते थे। पिछले करीब 10 साल से अब रामनगर, मुरादाबाद और हल्द्वानी में लगे मशीन प्लांटों में तांबे के बर्तन और अन्य शो पीस तैयार होने लगे हैं। मशीनों में बनने पर बर्तनों की लागत काफी कम आ रही है और उनमें चमक भी अच्छी होती है। इस कारण बड़े व्यवसायी मशीन से बने बर्तनों को प्राथमिकता देने लगे हैं। गागर, तोले, परात, लोटा, नरसिम्हा, नगाड़ा और तुरही जैसी चीजों की स्थानीय बाजार में खपत होती है। शादी-ब्याह में तांबे की गागर उपहारस्वरूप देने की परंपरा अब धीरे-धीरे खत्म हो रही । हर वर्ष परंपरागत रूप से लगने वाले मेलों में तांबे के बर्तनों की मांग जरूर होती है। तांबे का फिल्टर भी आजकल लोकप्रिय है। फिर भी तांबे के कारीगर मजबूरी में ही इस धंधे में लगे हैं हालांकि अपनी नई पीढ़ी को इस क्षेत्र में नहीं लाना चाहते हालांकि आज भी तांबे के बड़े बर्तन और फिल्टर आदि मशीन में नहीं बन पा रहे हैं। ताम्र व्यवसायी थोड़ा बहुत कच्चा माल लेकर बर्तन, शोपीस आदि तैयार करके स्थानीय व्यवसायियों को बिक्री के लिए उपलब्ध कराते हैं, लेकिन इससे वह बहुत अधिक नहीं कमा पाते। इस काम में लगे बताते हैं कि काफी मेहनत के बावजूद कमाई बहुत कम होती है।

लेखक के स्वतंत्र विचार है

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