किसानों पर लॉकडाउन के बाद पुलम उत्पादन

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड

रामगढ़, जहाँ अपने फलों के लिए विख्यात है, वहाँ यह अपने नैसर्गिक सौन्दर्य के लिए भी प्रसिद्ध है। हिमालय का विराट सौन्दर्य यहां से साफ-साफ दिखाई देता है। रामगढ़ की पर्वत चोटी पर जो बंगला है, उसी में एक बार विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर आकर ठहरे थे। उन्होंने यहाँ से जो हिमालय का दृश्य देखा तो मुग्ध हो गए और कई दिनों तक हिमालय के दर्शन इसी स्थान पर बैठकर करते रहे। उनकी याद में बंगला आज भी 'टैगोर टॉप' के नाम से जाना जाता है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को भी रामगढ़ बहुत पसन्द था। कहते हैं आचार्य नरेन्द्रदेव ने भी अपने 'बौद्ध दर्शन' नामक विख्यात ग्रन्थ को अन्तिम रूप यहीं आकर दिया था। साहित्यकारों को यह स्थान सदैव अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। महादेवी वर्मा, जो आधुनिक हिन्दी साहित्य की मीरा कहलाती हैं, को तो रामगढ़ इतना भाया कि वे सदैव ग्रीष्म ऋतु में यहीं आकर रहती थीं। उन्होंने अपना एक छोटा सा मकान भी यहाँ बनवा लिया था। आज भी यह भवन रामगढ़-मुक्तेश्वर मोटर मार्ग के बायीं ओर बस स्टेशन के पीछे वाली पहाड़ी पर वृक्षों के बीच देखा जा सकता है। जीवन के अन्तिम दिनों में वे पहाड़ पर नहीं आ सकती थीं। अत: उन्होंने मृत्यु से कुछ पहले इस मकान को बेचा था। परन्तु उनकी आत्मा सदैव इस अंचल में आने के लिए सदैव तत्पर रहती थी। ऐसे ही अनेक ज्ञात और अज्ञात साहित्य - प्रेमी हैं, जिन्हें रामगढ़ प्यारा लगा था और बहुत से ऐसे प्रकृति - प्रेमी हैं जो बिना नाम बताए और बिना अपना परिचय दिए भी इन पहाड़ियों में विचरम करते रहते हैंपूरे प्रदेश में आड़ू और पुलम का सबसे ज्यादा उत्पादन नैनीताल जिले के रामगढ़, धारी और भीमताल में होता है. इन्हीं के कारण नैनीताल जिले में रामगढ़ मुक्तेश्वर फल पट्टी काफी प्रसिद्ध है. इस पट्टी में सेब, आडू, पुलम, खुमानी, अखरोट की पैदावार सबसे ज्यादा होता है. रामगढ़ मुक्तेश्वर में बीते वर्ष आडू का उत्पादन बड़ी मात्रा में किया गया था. बता दें कि पिछले वर्ष जिले में आड़ू का उत्पादन 26428 मीट्रिक टन हुआ था, जबकि पुलम का उत्पादन 6294 मीट्रिक टन हुआ. इस साल भी जनवरी-फरवरी में हुई अच्छी बर्फबारी से काश्तकारों को अच्छी पैदावार की उम्मीद थी. लेकिन मार्च में हुई बेमौसम ओलावृष्टि के बाद टफरीना फंगस ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया.मौसम आधारित बीमा नहीं होने से किसान परेशान

Kalyan hospital

जिले में लगभग 40 हजार काश्तकार आड़ू और पुलम फल का उत्पादन करते हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ 15 हजार किसानों के पास ही मौसम आधारित बीमा है. मौसम आधारित बीमा नहीं होने की वजह से अधिकतर किसानों को ओलावृ्ष्टि की वजह से बरबाद हुई फसल की भरपाई नहीं मिल पाती है. गौरतलब है कि ज्यादातर किसानों को मौसम आधारित बीमा की जानकारी ही नहीं है. कोटाबाग, रामगढ़, धारी, ओखलकांडा भीमताल ब्लॉक में अधिकतर किसान मौसम आधारित फसल बीमा से अंजान हैं, उन्होंने संबंधित अधिकारियों पर बीमा के संबंध में जानकारी न मुहैया कराना का भी आरोप लगाया. लेकिन जिला उद्यान की अधिकारी ने इसे बेबुनियाद बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया. उनकी माने तो जिले में एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड की ओर से फलों और सब्जियों का बीमा किया जाता है. टफलीना फंगस से बचाव के लिए काश्तकारों को नवंबर माह में ही दवा का छिड़काव कर देना चाहिए था. लेकिन किसानों ने ऐसा नहीं किया जिसका वजह से टफरीना फंगस का प्रकोप बढ़ा कोरोना वायरस की वजह से नुकसान की नहीं हो सकी पूरी जांच
कोरोना वायरस के चलते पूरे प्रदेश को लॉकडाउन कर दिया गया है. जिसकी वजह से ओलावृ्ष्टि की वजह से होने वाले नुकसान की जांच नहीं जा सकी है. सचिव उद्यान ने बताया कि नैनीताल, अल्मोड़ा, पौड़ी, रुद्रप्रयाग, चमोली, पिथौरागढ़, बागेश्वर, उत्तरकाशी और टिहरी में 13 और 14 मार्च को हुई भारी ओलावृष्टि के बाद नुकसान के आकलन के निर्देश जारी किए थे. लेकिन अभी जिलों से रिपोर्ट आनी बाकी हैं. सचिव उद्यान ने कहा कि यह बीमारी अधिक बारिश और ओलावृष्टि के बाद सामने आती है. बारिश के बाद जब ह्यूमिडिटी बहुत ज्यादा होती है तो सेब, आडू ,पुलम ,खुमानी फलों के पेड़ों में यह बीमारी लग जाती है.  सरोवर नगरी नैनीताल के पर्वतीय इलाकों में टफरीना फंगस ने आड़ू और पुलम की खेती करने वाले किसानों के सामने नई मुश्किल पैदा कर दी है. ऐसे में किसानों को समझ नहीं आ रहा है कि वो इस बीमारी से फसल को कैसे बचाएं. दरअसल, टफरीना फंगस पहले आड़ू और पुलम के पेड़ों की पत्तियों को हरा और भूरा करना शुरू करती है और धीरे-धीरे पेड़ को सुखा देती है. बता दें कि मार्च में हुई ओलावृष्टि की वजह से पहले ही भारी नुकसान हो चुका है. आड़ू और पुलम की फसल 40 से 50 प्रतिशत तक चौपट हो गई थी. लेकिन अब टफरीना फंगस से किसानों को 90 प्रतिशत तक का नुकसान उठाना पड़ सकता है. ऐसे में किसानों को यह डर सता रहा है कि उनकी लागत कैसे निकलेगी. टफरीना फंगस का सबसे ज्यादा नुकसान रामगढ़, धारी और भीमतला के किसानों को हो रहा है. बीते 13 और 14 मार्च को नैनीताल के रामगढ़, धारी और भीमताल ब्लॉक में ओलावृष्टि ने काफी नुकसान पहुंचाया था. आडू और पुलम के फूल उस समय खिले थे, लेकिन ओलावृष्टि की वजह से करीब 90 प्रतिशत फूल गिर गए. हालांकि, सरकार के आदेश पर ओलावृष्टि से हुए नुकसान का सर्वे शुरू भी हुआ, लेकिन इसी बीच कोरोना संकट के चलते सर्वे को बीच में रोकना पड़ा था. इस सीजन का आडू के फलों के तोड़ने और बाजार में आने का सिलसिला शुरू हो गया है। कहा कि इस बार फल की पैदावार 20 से 25 प्रतिशत कम हुई है। हल्द्वानी मंडी में 250 से 300 रुपये प्रति डिब्बा बिक रहा है। इधर खुमानी और पुलम की पैदावार मात्र 10 प्रतिशत है। वहीं आडू के बागवानों ने बताया कि इस बार रामगढ़ का पुलम मुंबई और दिल्ली आदि राज्यों में नहीं भेजा गया था. पुलम यहाँ का सर्वोत्तम फल है।  तोतापरी, हिल्सअर्ली और गौला कि का आडू यहाँ बहुत पैदा किया जाता है।  इसी तरह खुमानियों की भी मोकपार्क व गौला कि बेहतर ढ़ंग से पैदा की जाती है।  पुलम तो यहाँ का विशेष फल हो गया है। ग्रीन गोज जाति के पुलम यहाँ बहुत पैदा किया जाते हैं। पिथौरागढ़ जिले में पुलम का उत्पादन 250 क्विंटल और खुबानी का उत्पादन लगभग सौ क्विंटल के आसपास होता है। मौसम ठीक रहने पर तीन सौ क्विंटल के आसपास आडृ , दो सौ क्विंटल पुलम और पचास क्विंटल के आसपास खुबानी बाजार में बिकने आती है। इस बार अभी तक बाजार से सब गायब है। बाजार में कहीं पर आडूू नजर तो आ रहा है परंतु उसकी कीमत साठ रु पए प्रति किलो से अधिक है। बीते वर्ष तक आड़ू बीस से तीस रुपए प्रति किलो, पुलम भी इसी रेट पर बिकता था। काफल लगभग पांच सौ से लेकर एक हजार क्विंटल तक बाजार में आता था। इस वर्ष नहीं के बराबर आया है। काफल बीते वर्षो तक तीस से चालीस रुपए किलो बिका परंतु इस वर्ष सीमित मात्रा में आए काफल की कीमत सौ रुपए किलो तक है। जिला उद्यान अधिकारी, ने बताया कि मौसम के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ है। बीमा कराए किसानों को नुकसान कराया जाएगा। कोरोना संक्रमण और फिर मौसम ने काश्तकारों को तगड़ा झटका दिया है।उत्तराखण्ड के 10 जिलों में की जाती है। प्राकृतिक जैव.संसाधनों व पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण मानव जाति को सतत विकास की राह प्रदर्शित करता है। ये संसाधन, अनुसंधान हेतु आवश्यक व महत्त्वपूर्ण आगत के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। अतः विकास की अंध.आंधी से पूर्व इनका संरक्षण करना चाहिए। दोहन खेती करने के बाद ही किया जा सकता है। ताकि इस बहुमूल्य सम्पदा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिकी का जरिया बनाया जा सके। करी पत्ता का उत्तराखंड में न तो इसका उत्पादन किया जाता है और न ही खेती की जाती है। उत्तराखंड में इसका इस्तेमाल न तो दवा के तौर पर भी किया जाता है। ऐसी को यदि बागवानी रोजगार से जोड़े तो अगर ढांचागत अवस्थापना के साथ बेरोजगारी उन्मूलन की नीति बनती है तो यह पलायन रोकने में कारगर होगी उत्तराखण्ड हिमालय राज्य होने के कारण बहुत सारे बहुमूल्य उत्पाद जिनकी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अत्यधिक मांग रहती था. हजारों करोड़ रुपए योजनाओं में खर्च करने के बाद भी राज्य में फ़ल उत्पादन क्षेत्रफल का घटता जा रहा है। पलायन आयोग की रीपोर्ट के अनुसार पौड़ी, टिहरी व अल्मोड़ा जनपदों में विभाग द्वारा दर्शाये गये आंकड़ों से हजारों हैक्टर कम पाया गया फल उत्पादन का क्षेत्रफल है। लेखक उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर कार्य कर चुके हैं वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।

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