पटवाडांगर पूर्व में स्टेट वैक्सीन इंस्टीट्यूट के नाम से था प्रसिद्ध

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड

सरोवर नगरी नैनीताल के निकट पटवाड़ागर में पाया जाने वाला पटवा पौंधा जो पूरी तरह से विलुप्त होने की कगार पर है, और जिसके दुनिया में कम ही पौधे ही बचे हैं, पटवा के बीज सख्त होने की वजह से प्राकृतिक तौर पर नए पौधे उगने की प्रक्रिया भी समाप्त होती जा रही है। वनस्पति विज्ञान में पटवा का वनस्पति नाम ‘मीजोट्रोपिस पेलीटाय” यानी पटवा की है। इस विलुप्तप्राय पौधे की दुनिया में पहचान सर्वप्रथम 1925 में ब्रिटिश वनस्पति वैज्ञानिक ऑसमॉसटोन ने सरोवनगरी के निकट पटवाडांगर में की थी। उनके अनुसार यह पौधा नेपाल के काली कुमाऊं एवं धोती जिले में भी पाये जाते थे। किंतु वर्तमान में यह पौधा उत्तराखंड के पटवाडांगर नाम के स्थान पर ही उपलब्ध है, और इसके यहां भी कम पौधे बचे हैं। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कुमाऊं विवि के जैव प्रौद्योगिकी विभाग भीमताल भीमताल में परियोजना के द्वारा इसके संर्वधन तथा संरक्षण के लिये ऊतक संर्वधन की एक प्रभावशाली विधि तैयार की जा रही थी ।

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पटवा पौधे में बहुत सुंदर नारंगी-लाल रंग के फूल खिलते हैं। इधर नए शोधों के उपरांत इस पौधे में वातावरणीय नाईट्रोजन नियतन एवं ऑक्सीकरणरोधी क्षमतायें भी पायी गयी हैं, तथा आगे भी इस बाबत शोध जारी हैं।वर्ष 1903 में स्थापित जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (पटवाडांगर) पूर्व में राज्य रक्षालय संस्थान (स्टेट वैक्सीन इंस्टीट्यूट) के नाम से प्रसिद्ध था। पूर्व में स्माल पॉक्स को खत्म करने के उद्देश्य से भारत में वैक्सीन का निर्माण पटवाडांगर से ही हुआ, और भारत को स्माल पोक्स मुक्त करने में इस संस्थान का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 1957 में इस संस्थान ने एंटी रैबीज नर्वस टिश्यू नामक वैक्सीन का उत्पादन शुरू किया। इसके बाद टिटनेस वैक्सीन का उत्पादन भी यही से हुआ, जो 2003 तक किया गया।भारत मे जिस दुर्लभ पौधे की पहचान 1925 में नैनीताल में हुई थी आज वही पटवा पौधा विलुप्त होने को है  मृदा संरक्षण में कारगर झाड़ीनुमा पौधे पटूवा धीरे-धीरे विलुप्ति की कराग पर पहुंच चुका था, लेकिन इस वर्ष कोरोना संक्रमण और शीतकाल वर्षा के चलते यह झाड़ीनुमा पौधा फिर से खिलने लगा है। पटूवा का वनस्पति नाम मेजोट्रोपिस पेलिटा है। यह 1400 मीटर की ऊंचाई पर शुष्क पहाड़ी और खुले चीड़ के जंगलों में होता है। इसकी खूबी यह है कि इस पौधे की जड़ सदैव जीवित रहती है, लेकिन सर्दियों में सुसुप्त हो जाती है। यानी नवंबर के बाद पौधा सूख जाता है। बसंत ऋतु आने पर दोबारा से यह पौधा हराभरा हो जाता है। बीते कई सालों से जड़ से दोबारा पौधा नहीं बन पा रहा है। इस वजह से यह विलुप्त होने लगा था।  वन अनुसंधान के अधिकारियों का दावा है कि लॉकडाउन के चलते पटूवा वनस्पति एक बार फिर से खिल उठी है। जिसका कारण लॉकडाउन और शीतकाल वर्षा माना जा रहा है। यह प्रजाति भारत में केवल नैनीताल के बल्दियाखान और काली कुमाऊं चंपावत के एक हिस्से में मिलती है। गत वर्ष के मुकाबले इस वर्ष पौधों में अच्छी रौनक देखी गई है। लॉकडाउन में पौधों में पुष्प भी अधिक मात्रा में खिले है। कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए लॉकडाउन व शीतकाल की वर्षा से पटवा के जंगल काफी खुश है। अब यह प्रजाति ‌विलुप्त से उभर कर अपने प्राकृतिक वास स्थल में पुनः स्थापित हो रही है। जो एक शुभ संकेत है। जलवायु परिवर्तन के असर से बीते 8-10 सालों में यहां की चोटियों में बर्फबारी नहीं हुई। इसलिए पटवा खत्म होने लगा था। लेकिन इस वर्ष पटवा खूब खिल था।इस विलुप्तप्राय पौधे की दुनिया में पहचान सर्वप्रथम 1925 में ब्रिटिश वनस्पति वैज्ञानिक ऑसमॉसटोन ने सरोवनगरी के निकट पटवाडांगर में की थी। उनके अनुसार यह पौधा नेपाल के काली कुमाऊं एवं धोती जिले में भी पाये जाते थे। किंतु वर्तमान में यह पौधा पूरे विश्व में सिर्फ उत्तराखंड के पटवाडांगर नाम के स्थान पर ही उपलब्ध है, जिसके नाम पर एक ऐसा कस्बा बसा हुआ है, जो दशकों तक विभिन्न शोधों के लिए विख्यात है पटवाडांगर की जमीन परिषद को हैंडओवर उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद हुई है। इस पूरी प्रक्रिया में सरकार की भूमिका नेतृत्व की नहीं बल्कि एक सहयोगी की होनी चाहिए। 2005 में अंततः इस संस्थान को बंद करके पंतनगर विश्वविद्यालय को दे दिया गया। 2007 तक सभी लोगों का स्थानांतरण कर दिया गया। पटूवा वनस्पति फिर से खिलगी पंतनगर में  बचाया जा सकाप्त है। पहाड़ का पानी और जवानी अब सिर्फ जुमला बन कर ना रहे हकीकत मे इसमे अब अमल हो यही उम्मीद सरकार से  है.

लेखक उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर कार्य कर चुके हैं वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।

 

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