प्रकृति का उपहार खरपतवार सिलोसिया अर्जेंटिया

सिसस कुआड्रानगुलेरिस यह विटेसी कुल की लता है जो खरपतवार के रूप में जंगल/वन क्षेत्र  में उगता है। इसे हठजोड़ के नाम से भी जाना जाता है, जो औषधीय गुणों से परिपूर्ण वनस्पति है। इसकी मुलायम पत्तियों एवं कोमल तने से भाजी पकाई जाती है।  इसकी सब्जी और बड़ियाँ भी बनाई जाती है।इसमें 3.43   % रेशा,  12.16   % प्रोटीन, 3.97 % लिपिड,  65.51   % कार्बोहायड्रेट, 532   पी.पी.एम. आयरन और 100 ग्राम भाग में 369  किलो कैलोरी उर्जा पाई जाती है। वैसे तो हठ जोड़ का प्रयोग टूटी हड्डियों को जोड़ने हेतु किया जाता है परन्तु इसे अन्य रोगों के निवारण के लिए भी उपयोगी माना जाता है।

Kalyan hospital

ऑस्टियोपोरोसिस रोग से बचाव तथा उच्च रक्तचाप के नियंत्रण में यह वनस्पति लाभकारी होती है। शरीर में कोलेस्ट्राल बढ़ने से रोकती है तथा  मधुमेह  के नियंत्रण के लिए कारगर पाई गई है। स्वास्थ लाभ के लिए हठजोड़ को उबालकर काढ़ा बनाकर इस्तेमाल किया जा सकता है।आज आवश्यकता है की हम औषधीय उपयोग की जैव सम्पदा का सरंक्षण और प्रवर्धन करने किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों में जन जागृति पैदा करें ताकि  अपनी परम्परागत घरेलू चिकित्सा (आयुर्वेदिक) पद्धति में प्रयोग की जाने वाली वनस्पतियों को विलुप्त होने से बचाया जा सकें। विभिन्न रोगों के निदान में वनस्पतियों/जड़ी-बूटियों के उत्पादों के बढ़ते उपयोग और बाजार में इन पौधों की बढती मांग को देखते हुए अब आवश्यक हो गया है की हमारे किसान भाई और ग्रामीण क्षेत्रों के बेरोजगार नौजवान प्रकृति प्रदत्त औषधीय वनस्पतियों को पहचाने और रोग निवारण में उनकी उपादेयता के बारे में समझें।  खेत, बाड़ी, सड़क किनारे अथवा बंजर भूमियों में प्राकृतिकरूप से उगने वाली इन वनस्पतियों को पहचान कर उनके  शाक, बीज और जड़ों को एकत्रित कर ग्रामीण जन अच्छा मुनाफा अर्जित कर सकते है। हमारे देश में प्रचलित औषधीय पादपों की कुल अवास्श्य्कता का केवल 25 प्रतिशत का उत्पादन किया जाता है एवं शेष वनस्पतियों को वनों, बागानों, खेतों, बंजर भूमियों, सड़क एवं रेल पथों के किनारे से एकत्रित किया जाता है।  खरपतवार के रूप में उगने वाली इन वनस्पतियों को वैद्य विशारद और आयुर्वेद दवाइयों के निर्माता अनेक वर्षो से एकत्रित करवाते आ रहे है। सभी  को ईमानदारी से को सामूहिक प्रयास करने होगें. प्रकृति से हर कोई वाकिफ है. हमें प्रकृति ने इतना कुछ दिया हैं कि उसका कर्ज हम नहीं भूल सकते. यह कहना गलत नहीं होगा के प्रकृति के बिना हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं है.

लेखक उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर कार्य कर चुके हैं वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।

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