एमबीबीएस की ज्यादा फीस से भावी डॉक्टरों की राह मुश्किल

उत्तराखंड ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां एमबीबीएस के लिए छात्र-छात्राओं को सालाना सवा चार लाख रुपये का शुल्क देना पड़ रहा हैउत्तराखंड में तीन सरकारी मेडिकल कालेज हैं। इन मेडिकल कालेजों में एमबीबीएस की फीस देश के नामी सरकारी मेडिकल कालेजों के मुकाबले चार गुना से भी अधिक है। फीस अधिक होने के कारण छात्र व अभिभावक परेशान हैं।

वर्ष 2018 तक तीनों राजकीय मेडिकल कालेजों में बांड व्यवस्था थी, जिसके तहत छात्र रियायती दर पर पढ़ाई कर सकते थे। अब दो साल पहले दून और हल्द्वानी मेडिकल कालेज में बांड व्यवस्था खत्म कर दी गई। छात्रों का कहना है कि बांड व्यवस्था के तहत फीस 50 हजार रुपये सालाना थी। बांड व्यवस्था खत्म होने से अब उन्हें तकरीबन सवा चार लाख रुपये सालाना देने पड़ रहे हैं।ऐसे में राज्य के मेधावी और सामान्य घरों के बच्चों के लिए एमबीबीएस की पढ़ाई मुश्किल हो गई है। मेडिकल छात्रों का कहना है कि अन्य राज्यों के सरकारी मेडिकल कालेजों में अधिकतम शुल्क 1.25 लाख तक है। ऐसे में राज्य सरकार यहां भी जल्द फीस कम करे। अगर बांड की व्यवस्था फिर से शुरू हो जाए तो भी उन्हें बड़ी राहत मिलेगी।यह फीस स्ट्रक्चर इसी सेशन से लागू होगा। ऐसे में उत्तराखंड में सरकारी कॉलेजों की फीस पड़ोसी स्टेट के सरकारी कॉलेजों से कई गुना अधिक हो गई है। उदाहरण के लिए ंिकंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी लखनऊ की एमबीबीएस की र्स्ट ईयर की फीस 53 हजार 600 रुपए है। मेरठ में गवर्नमेंट कॉलेज की फीस 43 हजार एनुअल है। इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश, हरियाणा में भी सरकारी कॉलेजों की फीस एनुअल 50 हजार से भी कम है। ऐसे में उत्तराखंड में पड़ोसी राज्यों से फीस स्ट्रक्चर कई गुना बढ़ा है।सीमांत प्रदेश उत्तराखंड वैसे ही पलायन को भयावह दंश झेल रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य की व्यवस्था लचर है, ऊपर से अव्यावहारिक फीस वृद्धि पैरेंट्स व स्टूडेंट्स को हतोत्साहित है। स्वास्थ्य सेवाओं के लिए उत्तराखंड हमेशा ही तरसता रहा है। खासकर पहाड़ के लोग स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में दम तोड़ देते है। आये दिन कई गर्भवतियों की मौत हो गई। अब राज्य को भविष्य के चिकित्सक मिलने मुश्किल है। प्रदेश के सरकारी मेडिकल कालेजों में एमबीबीएस की फीस चार लाख रुपये सालाना है। सरकार कॉलेजों में एक लाख टेबलेट मुफ्त देने की बात कर रही है दूसरी तरफ उनकी मांगों पर विचार नही करती है तो यह उनके साथ ज्यादती होगी ।उन्होंने सरकार से मांग की है कि उनकी जायज मांग पर सहानुभूति पूर्वक विचार किया जाए

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: