गांवों को आत्मनिर्भर बनाकर ही भारत को आत्मनिर्भर बनाने की हो सकती है शुरुआत!

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड

उत्तराखण्ड सरकार के गांव हर कामकाजी व्यक्ति के लिए संबल का प्रतीक हैं. बड़े-बड़े शहरों या विदशों में काम करने वाले भारतीय जब भी थोड़े उदास होते हैं, किसी परेशानी में फंसते हैं, किसी त्योहार में अकेले पड़ जाते हैं या वहां प्रदूषण आदि जब बढ़ जाता है, तो अचानक से गांव की याद आती है. मैंने कई लोगों को कहते सुना है और सुनता आ रहा हूं, ज्यादा दिक्कत होगी तो गांव चला जाऊंगा, वहीं अपने घर में रहूंगा और खेती-बारी करूंगा. भले कोई सुख सुविधा न मिले पर वहां सुकून तो मिलेगा.  ऊपर की ये बातें अधिकांश भारतीयों के जीवन में लागू होती हैं, चूंकि भारत को गांवों का देश भी कहा जाता है. जनगणना के आंकड़े भी कहते हैं कि भले ही शहर बढ़ रहे हों, लेकिन गांवों की आबादी में भी इजाफा हुआ है.गांव हमेशा से प्रासंगिक रहे हैं, लेकिन एक वैश्विक महामारी कोरोना वायरस ने गांव की महत्ता को आज और बढ़ा दिया है. चूंकि इस वायरस का फिलहाल कोई इलाज नहीं है, इसलिए सरकार ने इसका प्रसार न हो इसके लिए लगभग दो महीने से ज्यादा का लॉकडाउन घोषित किया. इस लॉकडाउन के दौरान अचानक तेजी से चल रहा देश थम गया और जो जहां था, वहीं फंस गया.  इतने समय के दौरान शायद ही ऐसा कोई आदमी हो, जिसे अपने गांव की याद न आयी हो.

 

हमारे देश का श्रमिक वर्ग जो विभिन्न राज्यों में अपनी श्रम शक्ति/कौशल का इस्तेमाल कर देश की अर्थव्यवथा को गति दे रहा है. वह अपने-अपने गांव आने के लिए आतुर दिखा.श्रमिक सब छोड़-छाड़कर पहले अपने गांव लौटना चाहते थे, इसकी तसदीक रोज टीवी और समाचार पत्र कर रहे थे. इस दौरान कई दुर्भाग्यपूर्ण हादसे भी हुए, फिर भी कई लोग दिखे जो साइकिल, पैदल, खुले ट्रकों में, ट्रेन से जैसे भी हो गांव लौटने पर अड़े दिखे.विभिन्न राज्यों में रह रहे लाखों श्रमिकों में से फिलहाल काफी लोग अपने-अपने प्रदेश लौट चुके हैं और लौटने का क्रम लगातार जारी है. कोरोना के भय और लॉकडाउन की दिक्कतों के कारण वापस लौटे श्रमिकों में से अधिकांश का कहना है कि अगले कुछ महीनों तक वे अपने गांव में ही रहेंगे.इतने बड़े पैमाने पर गांव में मानव संपदा लौटने से किसी भी प्रदेश की दशा और दिशा में बदलाव आ सकता है और वह आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को आत्मनिर्भर बनाने का आह्वान किया है. उन्होंने हाल ही में एक विशेष आर्थिक पैकेज का भी ऐलान किया है, जिसकी मदद से इस लक्ष्य को पाया जा सकता है. गांव कैसे सशक्त हों, हर हाथ को काम मिले, किसानों को आर्थिक समस्या न हो और उत्पादों का भी उचित मूल्य मिले इससे जुड़ी हर बात का ध्यान रखा गया है. आर्थिक क्षेत्र में भारत को एक नया मॉडल अपनाने की आवश्यकता है। यह मॉडल अपनी प्रकृति में देशज और स्थानिक होगा। यह सत्य है कि कोरोना संकट ने भारत के सामने अपनी अर्थव्यवस्था के व्यापक विकास और अंतरराष्ट्रीय विस्तार का ऐतिहासिक अवसर उपलब्ध कराया है। इस समय भारत को भौतिक विकास की जगह वैकल्पिक सभ्यता के विकास को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति भौतिकतावादी कभी नहीं रही। वास्तव में वह मानव मूल्यवादी आध्यात्मिक संस्कृति है। भारत को फिर से अपनी जड़ों की ओर लौटते हुए विकास का एक वैकल्पिक मॉडल विश्व के सामने रखना चाहिए। इस वैकल्पिक मॉडल में ग्लोबलाइजेशन के बरक्स लोकलाइजेशन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। विगत माह पंचायती राज दिवस के अवसर पर अपने एक महत्वपूर्ण संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्राम स्वराज की स्थापना पर बल दिया था। उन्होंने भविष्य में ‘मेक इन इंडिया’ को भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार बनाने का संकल्प भी व्यक्त किया है। इस ध्येय वाक्य को और सटीक और सार्थक बनाने के लिए ‘मेक इन रूरल इंडिया’ करने की आवश्यकता है। गांवों को आत्मनिर्भर बनाकर ही भारत को आत्मनिर्भर बनाने की शुरुआत हो सकती है।आज भारत के गांव शहरी जीवन-शैली और जीवन-मूल्यों के कूड़ाघर बन गए हैं। गांव से आत्मनिर्भरता, सामुदायिकता और मानवीय मूल्यों का लोप हो गया है। ग्रामीण जीवन के इन आधारमूल्यों का अपहरण आधुनिक औद्योगिक सभ्यता ने किया है। आज गांव ईष्र्या-द्वेष और क्लेश के अखाड़े हैं। वे विकृति, विद्रूप और व्यक्तिवाद के नवोदित महाद्वीप हैं। नशाखोरी और एकाकीपन वहां की नई जीवन-चर्या है। अब ग्राम्य-संस्कृति की पहचान रहे प्राचीनतम मूल्यों की घरवापसी का स्वर्णिम अवसर है। संतुलित और सतत विकास, सीमित उत्पादन और संयमित उपभोग ही भविष्य का रास्ता है।भारत को विकास को परिभाषित करते समय पश्चिमी देशों का मुंह ताकना बंद करना चाहिए। भारत में ग्राम आधारित कुटीर उद्योगों को पुनर्जीवित करके और छोटे एवं मझोले उद्योग-धंधों को मजबूती प्रदान करके ही भुखमरी, बेरोजगारी तथा अपराध जैसी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। इन उद्योगों की मजबूती ही खुशहाली का प्रवेशद्वार है। इसी से अंत्योदय भी संभव होगा। हाशिये पर खड़े अंतिम जन की चिंता करके ही आधुनिक राज्य अपनी सार्थकता सिद्ध कर सकता है उत्तराखंड के युवाओं का जीवन स्तर सुधारने और आर्थिक रूप से मजबूत करने में राज्य सरकार की नई उद्योग नीति बहुत सहायक हो सकती है। युवा चाहें तो सूक्ष्म, लघु व मध्यम श्रेणी उद्यमों के विकास की नीति से अपने साथ-साथ प्रदेश के हालात बदल सकते हैं।

 

नई उद्योग नीति का लाभ पर्वतीय इलाकों में उठाया जा सकता है। इससे बेरोजगार युवा स्वरोजगार के साथ-साथ दूसरों को भी रोजगार देने वाले बन सकते हैं। रोजगार को शुरू करने के लिए बहुत कम पूंजी लगाकर अधिकतम फायदा उठाया जा सकता है। ज्यादा फायदा उठाने और रोजगार को सुचारु रूप से चलाने के लिए जरूरी है कि उद्यम शुरू करने से पहले समूची नीति को अच्छी तरह समझा जाए है। राज्य की नई उद्योग नीति के संबंध में स्वरोजगार शुरू करने के लिए यह सुनहरा मौका है। वित्तीय प्रोत्साहनों, अनुदान सहायता के लिए हरित व नारंगी क्षेत्र तय हैं। बेरोजगार युवा मिल्क प्रोसेसिंग, बटर, चीज व अन्य डेयरी उत्पाद में भाग्य आजमा सकते हैं। मुर्गी पालन, होटल, अवकाश कालीन खेल तथा रोप वे में उद्यम चालू किया जा सकता है। होटल मैनेजमेंट, कैटरिंग एंड फूड क्रॉफ्ट, डाइंग प्लांट, गैर परंपरागत ऊर्जा उत्पादन आदि सेक्टरों में स्वरोजगार की शुरुआत की जा सकती है। इसमें निवेश प्रोत्साहन योजना तथा ब्याज उपादान योजना शामिल है। स्टांप शुल्क में भी छूट है। विद्युत बिलों की भी प्रति पूर्ति हो सकती है। कम-से-कम  1990 था, उत्तराखंड के जिस ग्राम्यांचल में मैं रहता था, वह साग-सब्जी की आवश्यकता के मामले में आत्मनिर्भर था. अब भी कमोबेश वैसी ही स्थिति की मैं कल्पना करता हूँ. आत्मनिर्भर कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि वहाँ साग-सब्जी का प्रचुर मात्रा में उत्पादन होता था, अपितु यह कि वहाँ के मूल निवासी इस दैनिक आवश्यकता के लिए बाज़ार पर निर्भर न थे, जो थे, वे भी बहुत कम थे .गांधी जी कहा करते थे कि भारत गांवों में बसता है। भारत को जानना है तो गांव को जानना पड़ेगा। स्वतंत्रता के 73 वर्ष बाद भी उनकी यह बात प्रासंगिक है। इसलिए भारत का इलाज करने के लिए लाइलाज होते गांवों के इलाज को प्राथमिकता देनी होगी।

इस लेख में दिए गए विचार लेखक के हैं।

लेखक द्वारा उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर का अनुभव प्राप्त हैं, वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत है.

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