क्यूं स्वतंत्रता, राष्ट्र के विकास में जरूरी है? जाने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक स्वतंत्रता के बारे में..

स्वतंत्रता क्या है? स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाते हैं? 15 अगस्त की जानकारी।

नीरज सिंह फर्त्याल

  • स्वतंत्रता
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता
  • संवैधानिक स्वतंत्रता

स्वतंत्रता क्या है: स्वतंत्रता का अर्थ है खुद को किसी भी प्रकार के तंत्र या जंजीरों से पृथक रखना। यूँ तो हर एक व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता के अलग मायने है। मेरी नजर में, तेज हवा में कटी पतंग हो जाना ही असल स्वतंत्रता है। जब आप बिना अपने कल, आज और आने वाले कल की चिंता छोड़कर बस अपनी धुन में उस पल का इतना आनंद ले रहे हो की आपको ये तक पता न चले की आपने ये सफ़र शुरू कहाँ किया था और इसे ख़त्म कहाँ करना है। उस आवारा बादल का कहीं भी बरस जाना स्वतंत्रता है, जो हम आज तक नहीं जान पाए की आया कहाँ से। चाँद का आना और बेवक्त बादलो में छिप जाना स्वतंत्रता है। चिड़िया का किसी भी समय चहचहाना स्वतंत्रता है। पहाड़ो से नदी का शोर करता हुआ निकलना स्वतंत्रता है। क्यूंकि ये सभी किसी के अधीन नहीं है। स्वतंत्रता वो है जो एक जानवर जंजीरों से रिहा होने पर महसूस करता है। जिसका एहसास हम सभी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में करते है। तब जब एक छोटे बच्चे को कहा जाए कि, “स्कूल का काम पूरा कर लिया है तो अब खेल सकते हो”। तब जब एक बारहवी उत्तीर्ण कर चूका छात्र या छात्रा, कॉलेज जाने की तैयारी करने लगता/लगती है। तब जब आप अपने दफ्तर की कुर्सी से अपना दैनिक कार्य पूरा कर उठते है। जिस प्रकार हर सिक्के के दो पहलू होते है, स्वतंत्रता को भी हम सकारात्मक और नकारात्मक रूप से विभाजित कर सकते है।  सकारात्मक पहलू के अंतर्गत हम स्वतंत्रता को इस प्रकार लिख सकते है कि कोई व्यक्ति विशेष वो सभी कार्य करने को स्वतंत्र है जो की उसके व्यक्तिगत और समाज हित में हों। वहीँ दूसरी तरफ नकारात्मक स्वतंत्रता में आप किसी भी कार्य के लिए प्रतिबंधित न हों। इसका चुनाव आप स्वयं ही कर सकते है कि कौन सी बातें आपकी सकारात्मक स्वतंत्रता दर्शाती है और कौन सी नकारात्मक।

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स्वतंत्रता के प्रकार- हर किसी व्यक्ति के जीवन में स्वतंत्रता के अलग अलग मायने है इस आधार पर हम स्वतंत्रता का भिन्न प्रकारों में विस्तार कर सकते है। मैंने इस लेख को बहुत ही सरल और विस्तार से लिखने की पुरजोर कोशिश की है यदि इसके अलावा भी आप इस विषय में अपना भी कोई प्रकार लिखना चाहते है या जोड़ना चाहते है तो आप इसके लिए पूर्णरूप से स्वतंत्र है।


व्यक्तिगत स्वतंत्रता : जैसा की मैं पहले ही लिख चूका हूँ की हर व्यक्ति विशेष की स्वतंत्रता की अपनी परिभाषा और अपने मायने है। किसी भी जीव के व्यक्तिगत जीवन से जुडी स्वतंत्रता को हम व्यक्तिगत स्वतंत्रता कह सकते है। मेरा आशय उन सभी कार्यो और फैसलों से है जो की अपने होने के लिए किसी दुसरे व्यक्ति या समाज पर आंशिक या पूर्ण रूप से निर्भर न हों। इसके लिए कोई भी व्यक्ति, समाज या धर्म किसी भी व्यक्ति विशेष पर कोई भी प्रतिबन्ध नहीं लगा सकता है। क्यूंकि ऐसे कार्यो या फैसलों का सीधा असर व्यक्ति के खुद के जीवन पर पड़ता है जिसके लिए वह स्वयं ही पूर्ण रूप से जिम्मेदार रहता है। आज भी हमारे देश में महिलाओं पर कई ऐसे प्रतिबन्ध लगाए जाते है जो की उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गहरा आघात पहुंचाते है। कहीं रीति रिवाजो का तो कही धर्म का, संस्कृति का पाठ जपकर महिलाओ की व्यक्तिगत स्वतंत्रता उनसे छीनने की बेजोड़ कोशिशे ये समाज करता रहता है जिसका अधिकार उन्हें है ही नहीं। हमें हर एक व्यक्ति के, चाहे वो पुरुष हो या महिला, निजी फैसलों के लिए उसे स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए और उसके हर एक फैसले का आदर करना चाहिए। तभी आप किसी को व्यक्तिगत तौर पर स्वतंत्र रख पाओगे।

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सामाजिक स्वतंत्रता: हमारे जीवन में बचपन से लेकर बुढ़ापे तक कई ऐसे पड़ाव आते है जहाँ हम आंशिक या पूर्ण रूप से किसी दुसरे पर आश्रित रहते है। जब हमारे जीवन के फैसले हम खुद नहीं बल्कि कोई और व्यक्ति विशेष हमारे लिए लेता है। बचपन में जैसे माँ या पिता ही हमारे सारे फैसले खुद लिया करते है और उन्ही माता पिता के बुढ़ापे में हम उनके अधिकतर फैसले लेने लगते है। बस यही है, सामाजिक स्वतंत्रता। जहां हम किसी के द्वारा किये गए कार्य के बदले, खुद उसके लिए अपने दायित्व पुरे करते है। यह एक उदाहरण मात्र था अपनी बात एक सरल तरीके से समझाने का। जैसा की मैंने स्वतंत्रता का सकारात्मक पहलू समझाते हुए लिखा है कि कोई भी व्यक्ति विशेष सभी कार्य करने को स्वतंत्र है जो वह करने में सक्षम है जब तक वो उसके व्यक्तिगत और समाज हित में हों। इसी आधार पर उत्पत्ति होती है समाज के प्रति हमारे दायित्वों और कर्तव्यों की। इन्सान ने खुद अपनी सुविधानुसार समाज के प्रति अपने कर्तव्यो की रचना की और खुद ही इन्हें समय समय पर अपनी सहूलियत के अनुसार बदलता गया। आज भी दुनिया के अलग अलग देशो में सामजिक स्वतंत्रता के आधार पर अलग अलग नियमो या कर्तव्यों को लिखा गया है। जब दुनिया का विभाजन यूँ अलग अलग देशो के रूप में नहीं किया गया था तब सामाजिक स्वतंत्रता अस्तित्व में नहीं थी। तब इसी प्रकार प्रकृति के प्रति हमारे कर्तव्य हुआ करते थे। क्यूंकि कोई भी जीव किसी दुसरे के प्रति निर्भर या अधीन नहीं था। हमारी उत्पत्ति प्रकृति से हुई है तो हमारे दायित्व भी प्रकृति के प्रति हुआ करते थे। जैसे जैसे इन्सान प्रकृति को छोड़ सुख सुविधाओं की ओर आकर्षित होने लगा तो इस विशेष वर्ग (समाज) के प्रति उसने अपने कर्तब्य इजाद कर लिए।

संवैधानिक स्वतंत्रता: यूँ तो संवैधानिक स्वतंत्रता लिखने के कई पहलू नजर आते है मगर अगस्त माह शुरू हो चूका है और भारतीय स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) को नजदीक आता देख इससे बेहतर और कोई नजरिया नहीं हो सकता। 15 अगस्त 1947 से पहले भारत कई साल अंग्रेजो का गुलाम रहा, जहाँ उसे अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक स्वतंत्रता गंवानी पड़ी और हम सभी इस बात से इंकार नहीं कर सकते की जिस स्वतंत्रता के बारे में, आज मैं स्वतंत्र होकर लिख सकता हूँ, और आप स्वतंत्र होकर पढ़ सकते है, उसे पाने के लिए मां भारती को कई सपूतो ने अपने लहू से सींचा है।  15 अगस्त 1947 को भारत को अंग्रेजो की गुलामी से आजादी मिली और 26 नवम्बर 1949 को भारतीय संविधान लिखा गया जो की 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। भारतीय संविधान में उन तमाम नियमो और कर्तव्यों को लिखा गया है जिसके अंतर्गत भारत का हर नागरिक, सरकार, नियमो का पालन करने के लिए बाध्य है। सरल शब्दों में कहे तो इन्सान की इन्सान के लिए बनाई गयी व्यवस्था ही संविधान है जिसमे की एक देश को चलाने हेतु रणनीतिया बनाई गई है और उसके नागरिको के तमाम सुविधाओं का ध्यान रखा गया है। इस संविधान के नियमो और अधिकारों के मुताबिक हर एक नागरिक अपनी संवैधानिक स्वतंत्रता तय कर सकता है। संवैधानिक स्वतंत्रता किसी की भी व्यक्तिगत और सामाजिक स्वतंत्रता से ऊपर है।

यूँ तो हिन्दुस्तान 15 अगस्त को अंग्रेजो की गुलामी से आजाद हो गया था। मगर आज भी हम कई समाज की कुरीतियों से मुक्त नहीं हो पाए है। हमारे देश में आज भी, बाल विवाह, दहेज़ प्रथा, जातिवाद जैसे कई मुद्दे है जिनसे हम आज तक स्वतंत्र नहीं हो पाए है। आज के समय पर भी समाज के हर तबके के इन्सान को बराबर की निगाह से नहीं देखा जाता है। हमें ऐसी रणनीतिया बनानी होंगी, जिससे हम समाज की इन कुरीतियों को ख़त्म कर एक नए कल का सवेरा देख पाए। स्वतंत्रता सिर्फ हमारे व्यक्तिगत स्तर पर नहीं बल्कि पुरे समाज के स्तर पर होनी चाहिए, तभी हम कह पायेंगे की हम पूर्ण रूप से स्वतंत्र है।

 

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इस लेख के जरिये मैंने अपने विचारो को आप सभी तक पहुँचाने की कोशिश की है। स्वतंत्रता एक ऐसा विषय है जिस पर हर एक व्यक्ति के अपने मत और अपने विचार हो सकते है। हो सकता है कि कई लोग मेरे विचारो से सहमत हों और कई नहीं, मगर यही इस विषय की खूबसूरती है। मैंने अपने विचारो को स्वतंत्र रूप से लिखा है और आप सभी भी स्वतंत्र है इनसे सहमत होने या न होने से वाद विवाद चलते रहेंगे, मगर हम सभी को एक होकर इस वतन की स्वतंत्रता के बारे में सोचना चाहिए, जिसके लिए माँ भारती के सपूतो ने अपना लहू बलिदान किया है।आओ साथ मिलकर एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना करें, जहाँ हर एक इन्सान अपने को सामान रूप से स्वतंत्र पाए। आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं, अपनी सामजिक स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुए अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता चुने, अपने अपनों का ध्यान रखें, अपने आस पास साफ़ सफाई रखें।
जय हिन्द, जय भारत!!

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