आफत की बारिश: हाईवे पर सफर खतरे से खाली नहीं एनएच

 डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड

उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में भूस्खलन का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। हालिया सात साल के आंकड़ों के अनुसार भूस्खलन की घटनाओं की संख्या 10 गुना से ज्यादा बढ़ चुकी है। कुछेए साल ऐसे भी गुजरे हैं जब ये घटनाएं तीस गुना तक ज्यादा थी।  वैज्ञानिक बढ़ते भूस्खलनों के लिए पर्वतीय क्षेत्रों में बारिश के पैटर्न में बदलाव और मानवीय गतिविधियों की वजह से पर्वतों के आकार और उनके ढलान में हो रहे परिवर्तन को वजह मानते हैं। यदि समय रहते इस ओर ध्यान न दिया गया तो समस्या आगे और भी बढ़ सकती है। हालिया कुछ समय में राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। चंपावत में इस मानसून सीजन में भूस्खलन की वजह से राष्ट्रीय राजमार्ग 104 बार बंद हुआ।

Harish chandra andola

टिहरी में अब तक भूस्खलन की 14 घटनाएं हो चुकी हैं। जबकि पिछले साल अब तक केवल आठ भूस्खलन ही हुए थे। न केवल चंपावत और टिहरी बल्कि प्रदेश के सभी पर्वतीय जिलों में यही हालात है। यदि पिछले सात साल के आंकडों पर नजर डाले तो काफी भयावह तस्वीर सामने आती है। डीएमएमसी के रिकार्ड के अनुसार वर्ष 2015 में महज 33 घटनाएं रिकार्ड की गई थी। जबकि वर्ष 2018 में यह संख्या 496, और वर्ष 2020 तक इन घटनाओं की संख्या 972 तक पहुंच गई थी। इस साल अब तक 132 भूस्खलन की घटनाएं रिकार्ड की गई हैं।खेती के लिए उपजाऊ मिट्टी एवं रहने के लिए कम ढाल वाली जमीन मिल जाने के कारण पहाड़ों में अधिकांश बस्तियां पुराने सुसुप्त भूस्खलनों पर ही बसी हुयी हैं। इसीलिये उत्तराखण्ड राज्य का 80 प्रतिशत हिस्सा अस्थिर ढलानों के कारण भूस्खलन की दृष्टि से काफी संवेदनशील है। राज्य में शायद ही कोई ऐसी बरसात गुजरती हो जब उत्तराखण्ड में भूस्खलन की आपदाएं नहीं होती हों। प्रदेश के लगभग 400 गांव भूसखलन की दृष्टि से संवेदनशील घोषित किए गए हैं, जिन्हें विस्थापित कर पुनः सुरक्षित स्थानों पर बसाया जाना है मगर सरकार को इतनी जमीन नहीं मिल रही है।वन अधिनियम के सख्त प्रावधानों के कारण सरकार को पुनर्वास के लिये वन भूमि भी नहीं मिल रही है। अधिक कमजोर, अत्यधिक घुमावदार और खंडित चट्टानें, खड़ी ढलानें, उच्च भूकंपीयता और प्रतिकूल जल-भूवैज्ञानिक स्थितियां राज्य की उच्च भूस्खलन संवेदनशीलता के लिए जिम्मेदार हैं। इसके अलावा अव्यवस्थित विकास निर्माण गतिविधियां भूस्खलन के जोखिम को और अधिक बढ़ती हैं। पेड़ के तने की वक्रता पेड़ की वृद्धि की अवधि के दौरान रेंगने की दर को रिकॉर्ड करती है।बारिश के मौसम में तो रेंगने या खिसकने की गति तेज होती ही है। जंगलों का बेतहासा कटान और खड़ी ढलानों पर निर्माण के कारण भी जमीन नीचे खिसकने की गति तेज हो जाती है। लोगों की बढ़ती आवासीय एवं विकास की आवश्यकता को पूरा करने के लिए में निर्माण गतिविधियां पूरी गति से चलती रही हैं। इन गतिविधियों के चलते नैनीताल की ढलानें और अधिक अस्थिर होती जा रही हैं, जिसने भूस्खलन खतरे को

कई गुना बढ़ा दिया है। भूस्खलन की समस्याओं को न्यूनतम रखने के लिए, ढलान अस्थिरता रोकने के उपायों पर गंभीरता से विचार किया जाना जरूरी है। कई जगहों पर लगातार भूस्खलन हो रहा है जिससे प्रतिदिन हाईवे पर लोग जान जोखिम में डालकर आवाजाही करने को मजबूर हैं।हाईवे चौड़ीकरण के बाद कई जगह अब खतरनाक बन गए हैं। बरसात में पानी से भरी चट्टानों में अब धूप निकलते के बाद भूस्खलन जैसी स्थिति बन रही है। बीते दो दिन पूर्व भटवाड़ी सैंण नैल में हाईवे पूरे दिन बंद रहा, जिससे वाहनों की वैकल्पिक मार्गों से आवाजाही हुई। बारिश होते ही यहां बार-बार पहाड़ी से मलबा और बोल्डर गिर रहे हैं जिससे निरंतर दुर्घटना की संभावना बनी है। हाईवे के डेंजर जोन का जब तक ट्रीटमेंट नहीं किया जाता तब तक यहां पर आवाजाही के दौरान लगातार नजर रखी जानी चाहिए। जिला आपदा प्रबंधन ने बताया कि 15 से 22 सितम्बर तक बड़ेथी के पास निर्माणाधीन ओपन टनल का कार्य किया जाना है। जिसके चलते यातायात आवगमन पूर्णतया बंद किया गया है। ताकि कोई बड़ा हादसा ना हो। इस दौरान सभी वाहन मनेरा बाईपास से आ व जा सकेंगे। उक्त अवधि के दौरान बरसात आदि होने पर तिथि को आगे बढ़ाया जा सकता है।   नहीं तो कभी बड़ा हादसा हो सकता है। कहा कि जन सुरक्षा के लिए शासन प्रशासन को जल्द एनएच को इन खतनाक स्थानों का उपचार करने के लिए निर्देशित किया जाना चाहिए।

लेखक द्वारा उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर का अनुभव प्राप्त हैं, वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत है.  

 

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