देश-विदेश में मशहूर है अल्मोड़ा की बाल मिठाई

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक नगरी अल्मोड़ा से ही बाल मिठाई और सिंगौड़ी का आविष्कार हुआ था. 1865 में सबसे पहले साह परिवार ने लाला बाजार में मिठाई बनाकर बेचना शुरू किया. दीपावली (में तो यहां के मिठाई की बात ही क्या. देश और दुनियां में अल्मोड़ा की मिठाई की मांग रहती है.

अल्मोड़ा आने वाले पर्यटक यहां की बाल मिठाई, सिंगौड़ी, चॉकलेट और खेचुआ ले जाते हैं. 1865 में लाला बाजार के साह परिवार ने मिठाई का आविष्कार किया. महात्मा गांधी ने भी 1929 में अल्मोड़ा आजादी आंदोलन में मिठाई का स्वाद लिया था. 24 नवम्बर को तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने हरीश लाल शाह को दिल्ली तीन मूर्ति भवन में बुलाकर मिठाई का स्वाद लिया. आज भी वही स्वरुप में मिठाई बिकती है. दुनिया का कोई कोना ऐसा नहीं होगा जिनके व्यजनों में मिठाई न आती हो. भारत की ही बात करें तो यहां के अलग-अलग राज्यों में विभिन्न प्रकार की मिठाईयां काफी मशहूर है. चाहे बंगाल के रसगुल्ले हों, आगरा का पेठा या मथुरा का पेड़ा. उसी प्रकार उत्तराखंड में मिठाईयों में बाल मिठाई काफी पंसद की जाती है. खासकर कुमाऊं प्रांत के अल्मोड़ा शहर जो कि बाल मिठाई के शहर के नाम से भी जाना जाता है. बाल मिठाई और सिंगौड़ी के आविष्कारक पिढ़ी के हरीश लाल साह का कहना है कि उनके बच्चों की पांचवी पिढ़ी मिठाई बेच रही है. जिस स्वरुप में पहले मिठाई बेचते थे आज भी उसी स्वरुप में मिठाई को बेच रहे हैं.  वहीं, मिष्ठान संघ के अध्यक्ष का कहना है कि अल्मोड़ा की मिठाई देश-विदेश में प्रसिद्ध है. जो भी लोग यहां आते हैं वे जरुर यहां की मिठाई को निशानी के रुप में ले जाते हैं. कई दिनों तक यहां की मिठाई खराब नही होती है. बाल मिठाई के बारे में कहा जाता है कि एक बार इसका स्वाद किसी की जवान पर चढ़ जाए तो वो फिर इसे भूला नहीं पाता. पीएम मोदी भी अल्मोड़ा की इस मिठाई का आनंद ले चुके हैं. उन्होंने कोरोनाकाल के दौरान जब हल्द्वानी निवासी पूरन चंद्र शर्मा से बात की थी तो कहा था कि वे बाल मिठाई का स्वाद एक बार फिर से लेना चाहते हैं. इस मिठाई का इतिहास डेढ़ सौ साल से अधिक पुराना है. अल्मोड़ा में बाल मिठाई के अविष्कारक हलवाई स्व. जोगा लाल शाह माने जाते हैं. जोगा लाल शाह ने 1857 में इस मिठाई का निर्माण ब्रिटिश शासन काल में शुरू किया था. धीरे धीरे इस मिठाई ने अपनी पहचान बनानी शुरू की.उन दिनों ब्रिटिश भी यहां की मिठाई को पसंद करते थे. वे बाल मिठाई को पानी के जहाजों के माध्यम से इंग्लैंड ले जाते थे. आज यह मिठाई न केवल अपने देश में प्रसिद्ध है वरन यह विदेशों में भी आज अपनी पहचान बना चुकी है. कोरोना ने इस बार कारोबार पर चोट की है, जिससे दशकों से इस व्यवसाय से जुड़े व्यवसायियों की हालत खस्ता है. जिस कारण मजबूरन कई दुकानदारों ने अब इस व्यवसाय से मुंह मोड़ लिया है.पूरे जिले भर के मिठाई कारोबारियों को इस सीजन में लगभग 5 करोड़ के नुकसान का आकलन लगाया जा रहा है. वहीं, इस कारोबार से जुड़े 500 के लगभग परिवारों पर रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है. अल्मोड़ा की बाल मिठाई विदेशों तक पहुंचती है.बाहर से अल्मोड़ा आने वाले पर्यटक वापस लौटे वक्त अपने साथ बाल मिठाई जरूर ले जाते थे. खासकर इन दिनों पर्यटन सीजन में बाल मिठाई की हर साल भारी बिक्री हुआ करती थी. जिससे बाल मिठाई के कारोबारियों की सालभर की आजीविका चलती थी.लेकिन विगत वर्ष की तरह ही इस साल भी कोरोना की दूसरी लहर ने ठीक पर्यटन सीजन पर उनके कारोबार पर चोट पहुंचाई है. पहले से घाटे में चल रहे बाल मिठाई व्यवसायियों की हालत अब खस्ता हो गई है. अल्मोड़ा के माल रोड में स्थित दर्जनों मिठाई की दुकानें लंबे समय से बंद पड़ी हैं. कोरोना ने इस बार कारोबार पर चोट की है, जिससे दशकों से इस व्यवसाय से जुड़े व्यवसायियों की हालत खस्ता है. जिस कारण मजबूरन कई दुकानदारों ने अब इस व्यवसाय से मुंह मोड़ लिया है.पूरे जिले भर के मिठाई कारोबारियों को इस सीजन में लगभग 5 करोड़ के नुकसान का आकलन लगाया जा रहा है. वहीं, इस कारोबार से जुड़े 500 के लगभग परिवारों पर रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है. अल्मोड़ा की बाल मिठाई विदेशों तक पहुंचती है.बाहर से अल्मोड़ा आने वाले पर्यटक वापस लौटे वक्त अपने साथ बाल मिठाई जरूर ले जाते थे. खासकर इन दिनों पर्यटन सीजन में बाल मिठाई की हर साल भारी बिक्री हुआ करती थी. जिससे बाल मिठाई के कारोबारियों की सालभर की आजीविका चलती थी.लेकिन विगत वर्ष की तरह ही इस साल भी कोरोना की दूसरी लहर ने ठीक पर्यटन सीजन पर उनके कारोबार पर चोट पहुंचाई है. पहले से घाटे में चल रहे बाल मिठाई व्यवसायियों की हालत अब खस्ता हो गई है. अल्मोड़ा के माल रोड में स्थित दर्जनों मिठाई की दुकानें लंबे समय से बंद पड़ी हैं. त्तराखंड के सभी जिलों में स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ‘एक जनपद, दो उत्पाद’ योजना लागू कर दी गई है ।मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की पहल पर तैयार की गई इस योजना का शासनादेश सोमवार को जारी कर दिया गया।योजना के तहत बाजार में मांग के अनुरूप कौशल विकास, डिजाइन विकास, रॉ मैटेरियल (कच्चे माल) के जरिए नई तकनीक के आधार पर प्रत्येक जिले में दो उत्पादों का विकास किया जाएगा।इस संबंध में मुख्यमंत्री ने कहा कि योजना का उद्देश्य उत्तराखंड के सभी 13 जिलों में वहां के स्थानीय उत्पादों को पहचान कर उनके अनुरूप परंपरागत तथा शिल्प उद्योग का विकास करना है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि 'एक जनपद, दो उत्पाद' योजना से स्थानीय काश्तकारों एवं शिल्पकारों के लिए जहां एक ओर स्वरोजगार के अवसर पैदा होंगे वहीं दूसरी ओर हर जिले के स्थानीय उत्पादों की विश्वस्तरीय पहचान बन सकेगी।
सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग विभाग के सचिव, अमित नेगी ने बताया कि अल्मोड़ा में ट्वीड एवं बाल मिठाई, बागेश्वर में ताम्र शिल्प उत्पाद एवं मंडवा बिस्किट, चंपावत में लौह शिल्प उत्पाद एवं हाथ से बने उत्पाद, चमोली में हथकरघा-हस्तशिल्प उत्पाद तथा एरोमेटिक हर्बल उत्पाद, देहरादून में बेकरी उत्पाद एवं मशरूम उत्पादन, हरिद्वार में गुड़ एवं शहद उत्पाद, नैनीताल में ऐपण कला एवं कैंडल क्राफ्ट को योजना के तहत चिन्हित किया गया है। जब उत्तराखंड एक पृथक राज्य बना था तो लोगों को उम्मीद थी कि यहां की भौगोलिक स्थिति को देखकर यहां के लिये कानूनों में भी कुछ परिवर्तन किये जायेंगे. आज के दिन एक भी कानून हमारे राज्य में ऐसा नहीं है जिसे हमारी भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार बदला गया हो. सरकारी नीतियों का प्रभाव कैसे हमारे जीवन पर पड़ता है आइये समझते हैं अल्मोड़ा की बाल मिठाई के माध्यम से.यह कोई अतिशयोक्ति न होगी अगर अल्मोड़ा और बाल मिठाई को एक दूसरे के पर्यायवाची कहा जाय. अल्मोड़ा कहते ही बाल मिठाई दिमाग में आती है और बाल मिठाई कहते ही अल्मोड़ा. बाल मिठाई न केवल अल्मोड़ा आने वाले पर्यटकों के लिये बल्कि यहां से गुजरने वाले हर यात्री के लिये इस शहर की सौगात है. पिछले एक दशक की बात की जाय तो अल्मोड़ा में बनने वाली बाल मिठाई के स्वाद में लगातार बदलाव आया है. अल्मोड़ा में गिनती की ही दुकानें हैं जहां पुराने स्वाद वाली बाल मिठाई आज भी बनती है.इसका एक मुख्य कारण है कि इसके लिये उपयोग में लाया जाने वाला खोया. वर्तमान में अल्मोड़ा की बाल मिठाई के लिये जिस खोया का प्रयोग किया जाता है वह दो प्रकार का है. एक मैदानों से ख़रीदा हुआ दूसरा पहाड़ों में बनने वाला.अल्मोड़ा में बनने वाली बाल मिठाई में मुख्यतः पहाड़ों में बने खोये का ही प्रयोग किया जाता था लेकिन बीते कुछ सालों में मैदानों से आने वाले बालदाने के साथ खोया भी मगाया जाने लगा है. सीमित शुद्ध पहाड़ी खोये के कारण ही आज भी अल्मोड़ा के प्रतिष्ठित बाल मिठाई की दुकानों में दोपहर तक बाल मिठाई खत्म हो जाती है.खैर, उत्तराखंड सरकार को समझना चाहिये कि वह सार्वभौमिक नीतियों के साथ उत्तराखंड का विकास कभी नहीं कर सकती. उत्तराखंड सरकार को चाहिये कि वह अपनी भौगोलिक स्थिति के आधार पर बने समाज को ध्यान में रखकर नीतियों का निर्माण करे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि इस योजना को लागू करने के पीछे उद्देश्य उत्तराखण्ड के सभी 13 जिलों में वहां के स्थानीय उत्पादों को पहचान के अनुरूप परंपरागत तथा शिल्प उद्योग का विकास करना है। मुख्यमंत्री ने कहा कि “वन डिस्ट्रिक्ट टू प्रॉडक्ट्स” से स्थानीय काश्तकारों एवं शिल्पकारों को जहां एक ओर स्वरोजगार के अवसर पैदा होंगे वहीं दूसरी ओर हर जिले में स्थानीय उत्पाद की विश्वस्तरीय पहचान बन सकेग है.

लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत  हैं।

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